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Aao Pepe, Ghar Chalen!
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Aao Pepe, Ghar Chalen!

by Prabha Khetan
4.9
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Creators
Author Prabha Khetan
Publisher Vani Prakashan
Synopsis प्रभा खेतान का यह उपन्यास आओ पेपे, घर चलें! मूलतः स्त्री-केन्द्रित उपन्यास है, जो अमेरिका की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। इसमें प्रभा स्वयं उपस्थित हैं। यह उस समय की मार्मिक कहानी है, जब प्रभा सिर्फ़ 22 वर्ष की थीं और ब्यूटी थैरेपी का कोर्स करने अमेरिका गयी थीं। प्रभा ने स्वयं निकट से वहाँ के भयावह सच को देखा-जाना, बुरे-से-बुरे पहलुओं से साक्षात्कार किया और स्वप्निल अमेरिका जिस आकार में उभर कर सामने आया, उसने प्रभा को सन्त्रास्त कर दिया। वास्तव में यह कहानी अमेरिकन वृद्धा आइलिन और उसके एलसेशियन कुत्ते पेपे के प्रसंगों के इर्द-गिर्द घूमती हुई आगे बढ़ती है। आइलिन रूखी और सख़्त मिज़ाज है, पर उसके भीतर मानवीय संवेदना के स्रोत फूटे पड़ते हैं। पेपे उसके जिगर का टुकड़ा है, जैसे कि उसी का जन्मा बच्चा। और स्त्रिायाँ भी हैं इसमें। हेल्गा है, जिसका घर टूट रहा है, पर वह विचलित नहीं, बिटिना है, जो माँ से जवाब तलब करने की क्षमता रखती है, कैथी जैसी जीवन्त महिला है, जिसे नीग्रो लोगों का घिराव नर्वस कर देता है, मिसेज़ डी. है, क्लारा है और भी स्त्रिायाँ हैं, जो कथ्य को सुगठित बनाती हैं। कुल मिलाकर यह उपन्यास असंगतियों से जूझते हुए मनुष्य की चुप्पी को चीख़ में बदलने का अहसास जगाता है।

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Paperback ₹299
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About the author डॉ॰ प्रभा खेतान (१ नवंबर 194 - 20 सितंबर 2008) प्रभा खेतान फाउन्डेशन की संस्थापक अध्यक्षा, नारी विषयक कार्यों में सक्रिय रूप से भागीदार, फिगरेट नामक महिला स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापक, 1966 से 1976 तक चमड़े तथा सिले-सिलाए वस्त्रों की निर्यातक, अपनी कंपनी 'न्यू होराईजन लिमिटेड' की प्रबंध निदेशिका, हिन्दी भाषा की लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकार, कवयित्री तथा नारीवादी चिंतक तथा समाज सेविका थीं। उन्हें कलकत्ता चैंबर ऑफ कॉमर्स की एकमात्र महिला अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त था। वे केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की सदस्या थीं। कोलकाता विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि लेने वाली प्रभा ने "ज्यां पॉल सार्त्र के अस्तित्त्ववाद" पर पीएचडी की थी। उन्होंने 12 वर्ष की उम्र से ही अपनी साहित्य यात्रा की शुरुवात कर दी थी और उनकी पहली रचना (कविता) सुप्रभात में छपी थी, तब वे सातवीं कक्षा की छात्रा थी। 1980-81 से वे पूर्ण कालीन साहित्यिक सेवा में लग गईं। उनके छह कविता संग्रह- अपरिचित उजले (1981), सीढ़ीयां चढ़ती ही मैं (1982), एक और आकाश की खोज में (1985), कृ्ष्णधर्मा मैं (1986), हुस्नोबानो और अन्य कविताएं (1987), अहिल्या (1988) और आठ उपन्यास- आओ पेपे घर चले, तालाबंदी (1991), अग्निसंभवा (1992), एडस, छिन्नमस्ता (1993), अपने -अपने चहरे (1994), पीली आंधी (1996) और स्त्री पक्ष (1999) तथा दो लघु उपन्यास शब्दों का मसीहा सार्त्र, बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ सभी साहित्यिक क्षेत्र में प्रशंसित रहे। फ्रांसीसी रचनाकार सिमोन द बोउवा की पुस्तक ‘दि सेकेंड सेक्स’ के अनुवाद ‘स्त्री उपेक्षिता’ ने उन्हें काफी चर्चित किया। इसके अतिरिक्त उनकी कई पुस्तकें जैसे बाजार बीच बाजार के खिलाफ और उपनिवेश में स्त्री जैसी रचनाओं ने उनकी नारीवादी छवि को स्थापित किया। अपने जीवन के अनछुए पहलुओं को उजागर करने वाली आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ लिखकर सौम्य और शालीन प्रभा खेतान ने साहित्य जगत को चौंका दिया। डॉ॰ प्रभा खेतान के साहित्य में स्त्री यंत्रणा को आसानी से देखा जा सकता है। बंगाली स्त्रियों के बहाने इन्होंने स्त्री जीवन में काफी बारीकी से झांकने का बखूबी प्रयास किया। आपने कई निबन्ध भी लिखे। डॉ॰ प्रभा खेतान को जहाँ स्त्रीवादी चिन्तक होने का गौरव प्राप्त हुआ वहीं वे स्त्री चेतना के कार्यों में सक्रिय रूप से भी आप हिस्सा लेती रहीं। उन्हें 'प्रतिभाशाली महिला पुरस्कार' और टॉप पर्सनैलिटी अवार्ड' भी प्रदान किया गया। साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिये केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का 'महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार' राष्ट्रपति ने उन्हें अपने हाथों से प्रदान किया।
Specifications
  • Language: Hindi
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Pages: 144
  • Binding: Paperback
  • ISBN: 9789390678556
  • Category: Novel
  • Related Category: Modern & Contemporary
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