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Story

हादसे ऐसे भी होंगे….!!

तभी मेरे साथ वह हादसा हुआ था। 13 अगस्त की रात। उस रात भयंकर बरसात हो रही थी। मैं शूट पूरा करके ट्रेन से जैसलमेर से दिल्‍ली आ रही थी। बहुत बड़ा प्रोजेक्‍ट था और पंद्रह दिन के बाद दिल्‍ली वापिस लौट रही थी। मैं सेकेंड एसी में थी और मेरी टीम के बाकी लोग अपने अपने हिसाब से दूसरे डिब्‍बों में थे। कम ही लोग थे हमारे डिब्‍बे में। हमारी 4 सीटों पर हम दो ही पैसेंजर थे। मैं अपना सारा सामान हमेशा अपने साथ ही रखती हूं। दो लैपटॉप, एक कैमरा, अलग अलग लेंसों का सेट, तीन मोबाइल, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पैन ड्राइव, वॉइस रिकार्डर और 1000 जीबी की एक एक्‍सटर्नल हार्ड, हैड फोन, ईयर फोन, ड्राइविंग लाइलेंस, आधार कार्ड, पैन कार्ड तथा कुछ और छोटे मोटे सामान। सबसे कीमती 1000 जीबी की एक्‍सटर्नल हार्ड डिस्‍क जिस पर मेरी अब तक की शूट की गयी सारी रॉ और फाइनल फिल्‍में सेव की हुई थीं। पूरे कैरियर में अलग अलग एजेंसियों के लिए बनायी हुई। कुछ फाइनल होने के करीब थीं और लौटते ही तैयार करके सौंपनी थीं। बहुत मेहनत और लगन से बनायी हुई कुछ अपनी फिल्‍में थीं मेरी जो मुझे बेहद प्रिय थीं और सही वक्‍त पर सही जगह सही कीमत पर बेची जानी थीं। कुल 100 से भी ज्यादा। इनमें वो रॉ फिल्म भी थी जो हम जैसलमेर से शूट करके ला रहे थे और ये मेरी अब तक की सबसे महंगी, और प्रेस्‍टीजियस फिल्‍म थी। 40 लाख की। मेरा ये सारा खज़ाना आधी रात में चलती ट्रेन में किसी ने चुरा लिया था। मैं बरबाद हो चुकी थी।

मेरा ये सारा कीमती सामान दो बैगों में था। इनके अलावा एक बड़ा पर्स और कपड़ों के लिए एक सूटकेस। सारी चीजें एक ही जगह रखने की अपनी जिद या खराब आदत के चलते ही ये हादसा हुआ था। ज़रूर कोई मेरे सामान पर निगाह रखे हुए होगा। ट्रेन में रात के वक्‍त बरसात का फायदा उठाते हुए कोई हाथ साफ कर गया। मैं एकदम से सड़क पर आने की हालत में आ गयी थी। सिर्फ मैले कपड़ों का सूटकेस ही छोड़ दिया गया था। मेरा पर्स और कीमती सामान के दोनों बैग जा चुके थे। पर्स तो बिल्कुल मेरे सिर के पास से ही उठा लिया गया था। पता नहीं रात को किस वक्‍त और किस स्‍टेशन पर ये हादसा हुआ होगा लेकिन मुझे सुबह उठने पर ही पता चला था। मैं खाली हाथ रह गयी थी। चाय लेने तक के पैसे नहीं बचे थे मेरे पास। मैंने शोर मचाया था, रोयी थी, चिल्लायी थी, लेकिन न तो मुझे कोई ढंग की सलाह मिल पायी थी और न ही कोई मदद मिल पायी थी। एटेंडेंट कुछ बता नहीं पाया था और टीटी का कुछ पता नहीं था। बेशक दो एक सहयात्री ज़रूर मेरी मदद के लिए आगे आये थे। मुझे नहीं पता था कि चोरी की रिपोर्ट कहां करनी है। मुझे ये भी खबर नहीं थी कि मेरे साथी किस किस डिब्‍बे में हैं। मैं बदहवास थी। किसी तरह एसी थ्री टीयर में जा कर अपने सहायक विपिन को खोजा था और उसके जरिये पूरी टीम तक खबर पहुंची थी। मेरे सारे सामान के जाने का मतलब मेरा और मेरी पूरी टीम का बेरोज़गार हो जाना था। सबसे पहले तो चोरी की रिपोर्ट लिखवानी थी। सहयात्रियों ने यही सलाह दी कि चोरी वाले या उसके बाद के सबसे नजदीक के स्‍टेशन पर ही रिपोर्ट लिखाना ठीक रहता है। यही सोच कर मैं और विपिन अगले स्‍टेशन पर उतर गये थे। ये अलवर जंक्‍शन था और यहां ट्रेन सिर्फ दो ही मिनट के लिए रुकती थी। तय था कि न तो दो मिनट में रिपोर्ट लिखी जा सकती थी और न ही किसी मदद की उम्मीद की जा सकती थी।

रेलवे पुलिस में रिपोर्ट लिखवाना इतना आसान नहीं था। बैग के साथ ही मेरा जर्नलिस्ट कार्ड भी जा चुका था और मुझे अपने आपको जर्नलिस्‍ट सिद्ध करने में ही अच्‍छी खासी तकलीफ़ हुई। संडे की सुबह होने के कारण वहां कोई जिम्‍मेवार आदमी नहीं था। एक सिपाहीनुमा आदमी बैठा था जिसे न हिंदी लिखनी आती थी और न ही कोई और भाषा ही। जिस आदमी को रिपोर्ट शब्द सही न लिखना आता हो उससे ये उम्मीद ही कैसे की जा सकती थी कि वह मेरे साथ न्याय करता या चोर को पकड़ने में मेरी मदद करता। उसने रिर्पोट लिखा था। साफ साफ लग रहा था उसे रिपोर्ट क्‍या, कुछ भी लिखना नहीं आता था। दो लाइनें लिखने में ही उसके पसीने छूटने लगे थे।

मैं गुस्से में तो थी ही, अड़ गयी – जब तक कोई जिम्‍मेवार पुलिसवाला वहां नहीं आयेगा, हम रिपोर्ट नहीं लिखवायेंगे और बिना रिपोर्ट लिखवाये जायेंगे नहीं।

तब वहां अच्छी खासी भीड़ जमा हो गयी थी। स्‍टेशन मास्टर को किसी ने खबर कर दी थी और वे भी वहीं चले आये थे। हमारा गुस्सा देख कर उन्होंने हमें शांत करने की कोशिश की और अलवर में मौजूद सबसे सीनियर रेलवे पुलिस वाले को बुलवा लिया गया था। पता नहीं किस रैंक का रहा होगा। लेकिन स्‍मार्ट और बातचीत में समझदार और कड़क लगा। उसने आते ही नयी समस्या खड़ी कर दी। बेशक ये पता चलने पर कि मैं पत्रकार हूं वह थोड़ा नरम हुआ। हमारे लिए चाय मंगायी। ध्यान से पूरी बात सुनी। पूछा क्‍या क्‍या सामान गया है। मैंने अपनी याददाश्त का सहारा लेते हुए चोरी गये सामान की पूरी सूची लिख कर दे दी। ब्रैंड नेम्‍स के साथ – जितना बताया जा सकता था।

– कुल कितने का सामान गया होगा?

– सामान की कीमत तो तीन लाख तक की होगी लेकिन लैपटॉप और हार्ड डिस्‍क में जो फिल्‍में थीं, मेरी इंटेलेक्‍चुअल प्रोपर्टी की कीमत भी लगायें तो चार से पांच करोड़।

– ये इंटेलेक्‍चुअल प्रोपर्टी क्‍या होती है? वह हैरानी से बोला था।

ऐसे तनाव पूर्ण पलों में भी मेरे चेहरे पर हल्की सी मुसकान आ गयी थी – आप नहीं समझ पायेंगे। एफआइआर लिखवाते समय इस मुद्दे को नहीं समझाया जा सकता। वैसे भी इस रिपोर्ट में उसका जिक्र करने का कोई मतलब नहीं। मैंने बात खत्म करनी चाही थी।

– लेकिन आप तो बता रही थीं कि आप पत्रकार हैं। इतना तो मैं भी जानता हूं कि ये सारा सामान पत्रकार तो लेकर नहीं चलते। उसने अपनी समझ दिखानी चाही थी।

– आप सही कह रहे हैं। मैं फिल्‍में बनाती हूं। डाक्‍यूमेंटरी फिल्‍में। एक फ्रेंच कंपनी के लिए। ये काम भी मीडिया में आता है।

– कैश कितना था?

– बीस हजार के करीब।

– कार्ड कितने थे?

– दो क्रेडिट कार्ड और एक डेबिट कार्ड। ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड, पैन कार्ड, हेल्‍थ इंशोरेंस कार्ड वगैरह।

– ब्‍लाक करवा दिये हैं?

मैं पहले ही हताश थी, बोली – अभी हमें ट्रेन से उतरे आधा घंटा भी नहीं हुआ। कार्ड की डिटेल्‍स या तो लैपटॉप या मोबाइल में सेव थीं या दिल्‍ली में घर पर होंगी। कुछ समझ में नहीं आ रहा क्‍या हो गया।

– लैपटॉप पासवर्ड से ही खुलते हैं या वैसे ही? उसने अपनी टैक्‍निकल जानकारी बघारी।

– थैंक गॉड, दोनों लैपटॉप पासवर्ड से ही खुलते हैं।

– मोबाइल कितने थे?

– तीन। इससे पहले कि वह मोबाइल की संख्‍या के बारे में कुछ कमेंट करता, मैंने उसे यह कह कर चुप किया कि ये सब प्रोफेशनल ज़रूरतें हैं।

अब उसने अपने पत्‍ते खोले – आपको अपनी रिपोर्ट उस स्‍टेशन पर लिखवानी चाहिये जहां आपको चोरी का पता चला।

मैंने अपने गुस्‍से पर काबू रखते हुए उसे बताया कि मुझे चलती ट्रेन में बीस मिनट पहले ही चोरी का पता चला और उसके बाद अलवर जंक्‍शन ही पहला स्‍टेशन आया है और हमने यहीं रिपोर्ट लिखवाने के लिए अपनी ट्रेन छोड़ी है।

यह सुनने के बाद वह एक पल के लिए रुका और नया फरमान सुना दिया – देखिये हम चाहेंगे और पूरी कोशिश भी करेंगे कि आपका सारा सामान आपको सही सलामत मिल जाये और चोर को सज़ा भी मिले लेकिन दो एक बातें आपको बता दूं। पहली तो आपकी इस चोरी के बारे में खबर अभी थोड़ी ही देर में वायरलेस से इस रूट के सभी थानों और स्‍टेशनों पर चली जायेगी। आपकी कई चीज़ें हैं। लैपटॉप, कैमरे, मोबाइल, कार्ड वगैरह। चोर आम तौर पर दो चार दिन ठहर कर सामान बेचने निकलते हैं। पर्स और उसका सामान सबसे पहले इधर उधर फेंकते हैं पैसे निकालने के बाद। हाँ, मोबाइल कम से कम एक महीना इस्‍तेमाल नहीं करते। उसके बाद ही सिम कार्ड निकाल कर मोबाइल ठिकाने लगाते हैं। लेकिन पुलिस के भी कई तरीके होते हैं अपने काम करने के और चोर पकड़ने के। चोरी के माल पर निगाह रखने के। चोर के बारे में या आपके सामान की खबर मिलते ही आपको यहां सामान की पहचान के लिए बुलाया जायेगा। ये बुलाना कई बार और तब तक होता रहेगा जब तक आपका सारा सामान न मिल जाये। तय है सामान कई जगह बेचा जायेगा और तभी उसके पकड़े जाने की उम्‍मीद बनेगी। अब आप बतायें कि क्‍या आपके लिए बार बार दिल्‍ली से यहां आना हो पायेगा। बात सिर्फ वहीं खत्‍म नहीं होती। पुलिस के रोल के बाद अदालत की कार्रवाई चलती है। बरामद होने के बाद भी आपको आपका सामान पुलिस नहीं दे सकती। ये काम अदालत के आदेश के बाद होता है। उनकी लम्‍बी प्रोसेस चलती है। मैं कुछ कहती इससे पहले ही उसने मुझे टोकते हुए कहा – मैं आपको हताश या निराश नहीं कर रहा। मेरी पूरी बात सुन लीजिये पहले फिर आप अपनी बात कहना।

  • तो इसका मतलब आप इस चोरी की रिपोर्ट नहीं लिख रहे?

– सॉरी मैडम, आप गलत समझ रही हैं। आपकी रिपोर्ट लिखी जायेगी और ज़रूर लिखी जायेगी लेकिन मैं आपके भले के लिए आपको बताना चाहता हूं कि ट्रेन के आखिरी स्‍टेशन पर भी रिपोर्ट लिखवायेंगी तो भी लिखी जायेगी और उस पर भी वैसे ही एक्‍शन होगा जैसे यहां पर रिपोर्ट लिखने से होगा। बस वहां रिपोर्ट लिखाने से आपको बार बार यहां आने की ज़हमत नहीं उठानी पड़ेगी।

मेरे लिये ये नया एंगल था। मैं कुछ सोच नहीं पा रही थी। वैसे भी अब मैं खाली हाथ थी और देखा जाये तो मेरे पास अब दिल्‍ली जाने का टिकट भी नहीं था। स्‍टेशन से घर जाने के लिए ऑटो के पैसे भी नहीं थे। पता नहीं कब तक ये हालत चलने वाली थी। मैंने विपिन की तरफ देखा था।

उसी ने पुलिस वाले से पूछा था – तब उपाय क्‍या है। दिल्‍ली वाले रिपोर्ट लिखेंगे क्‍या। वे भी तो आपकी तरह पहला सवाल यही पूछेंगे कि चोरी का पता चलते ही अगले स्‍टेशन पर रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवायी। आप राजस्‍थान में हुई चोरी की रिपोर्ट राजस्‍थान में नहीं लिख रहे तो वे राजस्‍थान की चोरी की रिपोर्ट दिल्‍ली में क्यों लिखने लगे। बीच में हरियाणा भी आने वाला है।

– और कुछ?

– क्‍या आपको नहीं लगता कि चोरी की जगह से आप ज्‍यादा नजदीक हैं और अभी चोरी हुए ज्‍यादा वक्‍त भी नहीं हुआ है। दिल्‍ली जा कर रिपोर्ट लिखवाने का मतलब वारदात की जगह से दूरी और एक्‍स्‍ट्रा टाइम?

इतनी देर में पुलिस वाला पहली बार मुस्‍कुराया था – आपकी दोनों बातें सही हैं। इस रूट पर ये पहली चोरी नहीं है। कई बार नार्थ से आने वाली गाड़ियों में भी चोरी हो जाती है तो रिपोर्ट राजस्‍थान में ही लिखी जाती है।

तभी विपिन ने अगला सवाल पूछ लिया – तो दिल्‍ली में रिपोर्ट लिखवाने का हमें फायदा ये होगा कि हमें बार बार जांच के सिलसिले में यहां नहीं आना पड़ेगा।

  • जी आपने सही समझा। पुलिस वाला अब संतुष्‍ट नज़र आ रहा था।
  • एक सवाल और। विपिन अब सारी तसल्‍ली कर लेना चाहता था।
  • जी कहिये

– दिल्‍ली वाले इस रिपोर्ट का क्‍या करेंगे, मतलब वे दिल्‍ली में जांच कैसे करेंगे जबकि चोरी राजस्‍थान में हुई है?

अब पुलिस वाला थोड़ा हकलाया – वे दरअसल इस रूट पर चोरी की घटना के बाद के सभी स्‍टेशनों पर रिपोर्ट की कॉपी भेजेंगे।

  • ठीक, तो इसका मतलब उसकी कॉपी जांच के लिए आपके पास भी आयेगी।

अब पुलिस वाला घिर चुका था – हां, आयेगी तो सही।

– और नियमानुसार आपका स्‍टेशन ही चोरी का पता लगने के बाद पहला स्‍टेशन पड़ता है।

अब उसके पास कोई जवाब नहीं था। विपिन उस पर चढ़ बैठा – और आप हमारी ही परेशानी बचाने के लिए कह रहे थे कि हम रिपोर्ट दिल्‍ली में लिखवायें। आप तो दिल्‍ली में सराय रोहिल्‍ला स्‍टेशन के रेलवे पुलिस इंचार्ज से हमारी बात भी करवा रहे थे। हद है। लेकिन आपने ये नहीं बताया कि वहां से रिपोर्ट आप ही के पास वापिस आनी है।

अब मैं समझी थी कि ये सारा नाटक रिपोर्ट लिखने से बचने के लिए था। मैं ये सोच के भी कांप गयी थी कि अगर हम इसकी बात मान कर दिल्‍ली चले गये होते तो कितनी परेशानी होती। बेशक पत्रकार जान कर रिपोर्ट लिख ली जाती लेकिन वही रिपोर्ट आखिर यहीं भेजी जाती। इस सारी कार्रवाई में समय बरबाद होता तो अलग।

अब वही स्‍मार्ट पुलिसिया आंय बांय तर्क देने लगा। स्‍टाफ की कमी का रोना रोने लगा।

अब विपिन ने कड़क आवाज में कहा – लिखिये हमारी एफआइआर और दीजिये हमें उसकी एक कॉपी। 

थाना इंचार्ज मजबूरन मुंशी जी से बोला – इन्‍हें काग़ज़ और कार्बन दे दीजिये और रिपोर्ट ले लीजिये। मैं जरा एक एसपी साहब के पास जा रहा हूं। बुलावा आया है। वैसे भी बहुत देर हो गयी है। 

अब उस पर चढ़ बैठने की बारी मेरी थी। उसका रास्‍ता रोक कर खड़ी हो गयी – हमें रिपोर्ट नहीं लिखनी है बल्‍कि एफआइआर लिखवानी है। हमें एफआइआर की कॉपी ही चाहिये।

रास्‍ता रोके जाने से वह चिढ़ गया – उससे आपको क्‍या फर्क पड़ता है। हम रिपोर्ट लिख तो रहे हैं। एक्‍शन भी लेंगे ही।

मैंने उसी की स्‍टाइल में जवाब दिया – इतना तो मुझे भी पता है और बाकी आपके काम करने के तरीके से पता चल गया है कि इससे फर्क हमें नहीं आपको पड़ता है। आप हमसे यही लिखवाना चाहेंगे कि ट्रेन में मेरा सामान खो गया है। इतना तो मुझे भी पता है कि सादे कागज पर लिखी इस रिपोर्ट के कोई मायने नहीं होते। आपको उस पर कोई एक्‍शन नहीं लेना होता। मेरा बहुत कीमती सामान चोरी हुआ है और हम आपके पास मदद मांगने ही आये हैं। हम यहां से एफआइआर लिखवाये बिना नहीं जायेंगे। मैं जर्नलिस्‍ट हूं और काम करवाने के तरीके हमें भी सिखाये गये हैं। वैसे भी आप हमारा पूरा एक घंटा बरबाद कर चुके हैं।

उसने जाते जाते मुंशी को हाथ से इशारा किया और तेजी से निकल गया।

मुंशीजी ने कम से कम दो घंटे लगाये एफआइआर लिखने में। एक तरह से विपिन ने ही सारा काम किया। सादे कागज पर उसे लिख लिख कर सारी बातें बतायीं जिसे उसने रजिस्‍टर में कॉपी किया। जब तक एफआइआर की कॉपी हमें मिलती, दोपहर हो चुकी थी। साथ में बीस हिदायतें – शहर छोड़ कर मत जायें। लगातार संपर्क में रहें। कभी भी बुलाया जा सकता है। अपना कांटैक्‍ट नम्‍बर छोड़ जायें। अभी अपने नम्‍बर ब्‍लाक न करवायें और अपने खोये नम्‍बरों पर बार बार फोन करके देखती रहें। कभी इंगेज मिले तो हमें बतायें। मजे की बात, मुंशी ने थाने का नम्‍बर भी नहीं दिया था। पहले तो वह रेलवे वाला नम्‍बर दे कर ही टालना चाहता था लेकिन जब विपिन ने कहा कि हम रेलवे वाले नम्‍बर पर बात ही कैसे कर सकते हैं तब जा कर उसने थाने का नम्‍बर दिया था। विपिन अब बहुत सेफ गेम खेल रहा था। अपने मोबाइल से उस नम्‍बर पर एक बार फोन करके चैक कर लिया कि हमें सही नम्‍बर दिया गया है। फिलहाल रिपोर्ट में विपिन का ही नम्‍बर लिखवाना पड़ा था। हमें जो हिदायतें गिनवायी गयी थीं, वे सारे काम पुलिस के थे जो हमें करने थे और जो हिदायत ज़मानत पर छूटे चोरों को दी जाती है, कि शहर छोड़कर न जायें, वह हमें दी गयी थी। बस, हमें यही नहीं कहा गया कि चोर को पकड़ कर भी ले आयें और उनके हवाले कर दें।

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अब मेरे पास करने को कोई काम नहीं था लेकिन अचानक ही मैं बहुत बिज़ी हो गयी थी। घर पर एक पुराना मोबाइल पड़ा था, फिलहाल उसी में एक नया सिम कार्ड डाल कर वह नम्‍बर अलवर के थाने में दर्ज करवा दिया था। संयोग से जब तीनों मोबाइल खरीदे गये थे तो वेंडर से ही उनके आइवी नम्‍बर नोट करवा लिये थे। तब पता नहीं था कि ये आइवी नम्‍बर कितने काम आने वाले थे। मैंने पुलिस को ये नम्‍बर भी दे दिये थे।

हालांकि अलवर के पुलिस थाने से संपर्क करना इतना आसान नहीं होता था। कभी नम्‍बर न मिलता तो कभी ड्यूटी पर बैठे पुलिस वाले को मेरे केस के बारे में कुछ भी पता  न होता। हर बार सारी बातें बतानी पड़तीं। कई बार आधा आधा घंटा तक होल्‍ड कराया जाता और कोई जवाब न मिलता।

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अब हालत ये थी कि मुझसे कोई फोन पर बात नहीं कर सकता था और मेरे पास किसी का नम्‍बर ही रहा नहीं था। पूरी दुनिया से कट जाने की-सी हालत हो गयी थी। पुलिस की सलाह थी कि जब तक आपके मोबाइल ट्रैक न हो जायें, मैं वही नम्‍बर न लूं। मज़बूरन मैंने फेसबुक और ईमेल के जरिये सभी पार्टियों, दोस्‍तों और परिचितों से कह दिया था कि मेरे तीनों नम्‍बर चोरी हो चुके हैं और मेरे पास किसी का भी नम्‍बर नहीं है। सब लोग मुझे अपना नम्‍बर दें या मेरे नये नम्‍बर पर कॉल करें। अब ईमेल भेजने या चैक करने के लिए साइबर कैफे या दोस्‍तों के यहां जाना पड़ता था। अभी नया लैपटॉप खरीदना किसी ऐय्याशी से कम नहीं था। मेरी किस्‍मत अच्‍छी थी कि जब तक मैं अपने डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड ब्‍लॉक करवाती, उनसे कोई शॉपिंग नहीं की गयी थी। इसका मतलब चोर सड़क छाप चोर ही रहा होगा और कार्ड इस्‍तेमाल करने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया होगा। पूरे स्‍टॉफ की सेलरी बाकी थी और मैं कुछ नहीं कर पा रही थी। एजेंसी को मैंने चोरी के बारे में बता दिया था लेकिन वहां से अभी तक किसी तरह का आश्‍वासन नहीं आया था। मैंने संदेश भिजवाया था कि अगर वे कुछ फंड्स दे दें तो फिल्‍म रीशूट करने के बारे में सोच सकती हूं। इससे मेरी फंसी हुई रकम निकलने की उम्‍मीद बंधती थी। संयोग से फिल्‍म की स्‍क्रिप्‍ट और दूसरी डिटेल्‍स विपिन के लैपटॉप में मिल गये थे। इस फिल्‍म की कुछ फुटेज भी मिल गयी भी। मेरे पास अपनी बनायी फिल्‍में भी तो नहीं बची थीं कि उन्हें ही बेच कर कुछ पैसे जुटा लेती। कुछ दोस्त थे जिनके पैसे मेरी फिल्‍मों में लगते ही रहते थे। इन्‍वेस्‍टमेंट या पार्टनरशिप के रूप में। मेरी हालत देख कर सब चुप थे बल्‍कि मेरी छोटी मोटी ज़रूरतों के लिए मदद भी कर रहे थे लेकिन बड़े पेमेंट जस के तस खड़े थे और मेरी नींद हराम किये हुए थे।

मन पर बहुत बोझ था उन दिनों। अपनी तकलीफें किसी से शेयर करना चाहती थी लेकिन किसी की निगाह में लल्‍लू लाल भी नहीं बनना चाहती थी। बेशक लापरवाही हो चुकी थी और उसका खामियाजा भुगत भी रही थी लेकिन हर कोई मुझे उसके लिए उपदेश दे या लैक्‍चर पिलाये, ये मैं गवारा करने को तैयार नहीं थी।

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मैं उस रात साइबर कैफे में गयी थी तो फेसबुक पर मुंबई में रह रही मेरी दोस्‍त सिमरन ऑनलाइन मिल गयी थी। मैंने उसे पूरा किस्‍सा बताया था। बताया कि मेरे पास अभी नया नम्‍बर नहीं है, वह अपना मोबाइल नम्‍बर दे दे। वह इस हादसे को सुन कर बेहद परेशान हो गयी थी और उसने हर तरह की मदद की पेशकश की थी। मुझसे कसम ली थी उसने कि कुछ भी ज़रूरत हो तो मैं उससे कहूं। बैंक में पैसे ट्रांसफर करने के लिए मेरा बैंक एकाउंट नम्‍बर तक मांग लिया था। जब मैंने बताया कि ज़रूरत होगी तो उसी से और सिर्फ उसी से कहूंगी तो उसने एक और प्रस्‍ताव रख दिया था – तुम्‍हारे लैपटॉप भी तो गये हैं। मेरे पास एक एक्‍स्‍ट्रा रखा है। हाल ही में नया खरीदा है हालांकि पुराने से भी ठीक काम चल ही रहा था। मैं कूरियर कर देती हूं। इसके लिए तो मना मन करना। बेशक मुझे लैलटॉप की बेहद ज़रूरत थी और मैं नया लैपटॉप खरीदने की हालत में नहीं थी, फिर भी मैं उससे इतना बड़ा अहसान लेने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रही थी। आखिर फेसबुक फ्रेंड ही तो थी जिससे न कभी मिली थी और न कभी मिलने की संभावना ही नज़र आती थी।

चैट खत्‍म होते ही उसने मेरे नये नम्‍बर पर फोन किया था और पहली बात यही कही थी कि कुछ काम न हो तो मूड बदलने के लिए मुंबई ही चली आओ। चेंज भी हो जायेगा और फिर तुम्हारे लिए यहां काम की कोई कमी नहीं रहेगी। रहने के लिए मेरा घर है ही सही लेकिन मैंने ही मना कर दिया था कि रोज़ाना ही पुलिस के मैसेज का इंतजार रहता है। वहां के चक्‍कर भी काटने पड़ते हैं। पता नहीं कब मेरे काम का बुलावा आ जाये। सिमरन से बात करने पर अपने आप पर गर्व हो आया था कि फेसबुक ने हमारे लिए कितनी खूबसूरत दुनिया की खिड़की खोल दी है वरना सिमरन जैसी दोस्‍त कैसे मिलती मुझे। यहां किसी जानकार या दोस्‍त ने कभी नहीं कहा कि मेरा पुराना लैपटॉप या पुराना मोबाइल ही रख लो कुछ दिन के लिए।

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बाद में जब मेरे एक लोकल दोस्‍त को पता चला था कि मुंबई में रहने वाली मेरा एक फेसबुक फ्रेंड अपना लैपटॉप मुझे कूरियर करने के लिए तैयार बैठी है तो वह हँसा था – मत चूको चौहान। लपक लो। आजकल ऐसे बेवकूफ मिलते कहां हैं। मुझे उसकी बात सुन कर बेहद तकलीफ हुई थी कि आजकल ईमानदार होना और अनजान आदमी की मदद के लिए आगे आना भी बेवकूफी माना जाने लगा है। शर्म भी आयी थी कि एक ये हैं जो मदद करने वाली फेसबुक फ्रेंड को बेवकूफ बता रहे हैं और मुझे न चूकने की सलाह दे रहे हैं जबकि कम से कम दस बरस से मेरे परिचित हैं लेकिन कभी ये नहीं सेाचा कि हजार दो हजार रुपये ही उधार ही दे दें या उनके ऑफिस मिलने आयी हूं तो एक कप कॉफी ही पिला दें। बाद में बेशक मैंने सिमरन से ये झूठ बोला था कि मेरा नया क्रेडिट कार्ड आ गया है और मैंने कार्ड पर नया लैपटॉप ले लिया है। लैपटॉप लेने से ज्‍यादा जरूरी अपनी टीम की सेलरी देना था और जहां से भी थोड़े से पैसों का इंतजाम होता, मैं कर्ज उतारती। पर्सनल काम तो कुछ दोस्‍तों के आफिस जा कर या साइबर कैफे जा कर चल ही रहा था।

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दिल्‍ली से अब मेरा मन उचट चुका था। काम कुछ था नहीं और पुलिस कोई मदद नहीं कर रही थी। सिर्फ आश्‍वासन थे जो हर बार दोहराये जाते थे। मैं सरकार में, मंत्रालयों में और पुलिस में अपने सारे सम्‍पर्क खटखटा चुकी थी। बस अब एक ही उपाय बाकी था कि अलवर जा कर रेलवे पुलिस थाने के आगे भूख हड़ताल पर बैठ जाऊं। दो महीने हो चुके थे और हर दिन बीतने के साथ सामान वापिस मिलने की उम्‍मीदें कम होती जा रही थीं। इधर नया कोई काम मिल नहीं रहा था। तकलीफ ये भी थी कि अब तक पूरी ज़िंदगी किसी के अधीन काम किया नहीं था और अब ऐसे की काम मिल रहे थे। पुराना काम पूरे करने के न तो साधन थे और न ही उत्‍साह।

अपने अच्‍छे दिनों में मैंने खूब पैसे कमाये थे तो पटना में एक घर खरीदा था। अब उसे बेचने की नौबत आ गयी थी। जो फिल्‍में पूरी कर चुकी थी, वे दोबारा शूट करनी पड़तीं या उनके लिए जो एडवांस ले रखा था, वह लौटाना था। कुछ काम ऐसे भी थे जिनके लिए पार्ट पेमेंट आ चुका था और काम शुरू करना था। दोनों ही तरह के काम करने की इच्‍छा ही नहीं रही थी। देनदारियां लाखों में थीं और लेनदारियां उंगलियों पर गिनी जा सकती थीं। फ्लैट बहुत नुक्‍सान में बेचना पड़ा था लेकिन कुछ हद तक कर्जे उतर गये थे। बाजार में अपनी साख बनाये रखने के लिए ऐसा करना जरूरी था।

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इस बीच मैं पहले ही दिन से अपनी ड्यूटी लगातार निभा रही थी। मेरा एक ही काम था। दिन में कई कई बार चोरी गये तीनों मोबाइलों के नम्‍बर मिलाना। शायद चोर कभी गलती से फोन उठा ही ले या मेरे किसी भी मोबाइल से किसी से बात कर रहा हो और नम्बर इंगेज आ रहा हो। वैसे भी जब तक अपनी सभी पार्टियों को न बताया जाये, सभी उन नम्‍बरों पर ही फोन करते रहने वाले थे। एक बार भी चोर ने मोबाइल एटेंड कर लिया तो पुलिस की साइबर ब्रांच के लिए उसकी लोकेशन पता करना आसान हो जाता है। दो बार ऐसा हुआ कि मेरा एक मोबाइल लगातार एक घंटे तक इंगेज आता रहा। वह मेरा सबसे कीमती मोबाइल था। मैंने तुरंत पुलिस को इस बारे में बताया था। उन्होंने इस बात को नोट कर लिया था और मुझे आश्‍वस्‍त किया था कि मैंने उनका काम आसान कर दिया है। अब चोर का पता लगाना आसान हो जायेगा।

इसके बाद भी कई दिन तक वहां से मुझे कोई बुलावा नहीं आया था और फोन करने पर संतोषजनक जवाब न मिलता। एक बार फिर मैं थी और हताशा थी।

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      तभी कुछ ही दिन के अंतराल पर मेरे तीनों मोबाइल फोनों के बिल आये थे। मैंने लपक कर बिल खोले थे और की गयी कॉल और रोमिंग के ब्‍यौरे जांचे थे। दो मोबाइलों से चोरी की तारीख के बाद कोई कॉल नहीं की गयी थी लेकिन मेरे सबसे महंगे वाले सैमसंग के मोबाइल से दो दिन में एक ही नम्‍बर पर इक्‍कीस कॉल किये गये थे। मैंने अपनी डायरी चेक की। ये वही और उसके बाद वाली तारीख थी जब मैंने पुलिस को मोबाइल इंगेज मिलने की खबर दी थी।

मैंने तुरंत विपिन को बुलवाया था। बिल स्‍टेटमेंट देखने के बाद उसे भी यकीन हो चला था कि इस नम्‍बर के जरिये जरूर चोर तक पहुंचा जा सकता है। आखिर कोई अंजान आदमी को दो दिन में 21 बार फोन नहीं करता और कुछ बार तो एक एक घंटे तक बात की गयी थी। तभी विपिन को कुछ याद आया था और उसने अपने मोबाइल निकाल कर ये नम्‍बर अपने मोबाइल में फीड किया था। विपिन के चेहरे पर चमक आ गयी थी। जब पूछा मैंने तो उसने अपना मोबाइल मेरे आगे कर दिया था। स्‍क्रीन पर नीचे की तरफ एक नाम चमक रहा था – सुषमा परीक। जयपुर सर्कल। साथ में मोबाइल कंपनी का नाम। जब मैंने पूछा कि ये क्‍या है तो उसने बताया था- एक साफ्टवेयर है – ट्रू कॉलर। मेरे मोबाइल में है। इससे किसी भी नम्‍बर के यूजर, लोकेशन और सर्विस कंपनी का पता चल सकता है। अब ये तो पता चल गया है कि इस नम्‍बर पर कोई लड़की है। जरूर चोर की गर्ल फ्रेंड होगी। लोकेशन के बारे में कुछ कह नहीं सकते क्‍योंकि जयपुर सर्कल में आसपास के दो तीन सौ किमी के घेरे के सारे नम्‍बर आ जाते हैं। शायद उसकी मोबाइल कंपनी के कस्‍टमर केयर सेंटर से कुछ और पता चल सके।

ये हमारे केस के हिसाब से बहुत बड़ा क्‍लू था जो अचानक हमें घर बैठे मिल गया था। अब सुषमा परीक की लोकेशन पता करनी बाकी थी जिससे पता चल सकता था कि चोर जयुपर या उसके आसपास के किस शहर का है। हम मोबाइल कंपनी के कस्‍टमर केयर सेंटर गये थे लेकिन एफआइआर की कापी देखने, मेरा जर्नलिस्‍ट कार्ड देखने और सारे तर्क सुनने के बाद भी वे हमें इतना ही बताने के लिए तैयार हुए थे कि वह नम्‍बर किस कंपनी का है। वे जितना बता रहे थे हम पहले से ही उससे ज्‍यादा जानते थे।

हालांकि हम अब यूजर का नाम भी जानते थे और उस नम्‍बर पर फोन करके कुछ भी बात करके हम उसका पता पूछ सकते थे लेकिन जरा सी भी हड़बड़ी हमें भारी पड़ सकती थी। वैसे भी पुलिस ने पिछले दो महीने में अपनी तरफ से एक पत्‍ता तक नहीं हिलाया था। कई चक्‍कर लगाने के बाद और एक तरह से गिड़गिड़ाने के बाद यही पता चला था कि इस बात को उन्‍होंने मेरी फाइल में दर्ज तो कर लिया था लेकिन मेरे मोबाइल से किये गये नम्‍बरों के मालिकों के बारे में पता लगाने के लिए अब तक कुछ किया नहीं था। जब पिछली बार अलवर गयी थी तो मैं अपने गुस्‍से पर काबू न रख पायी थी और एक तरह से पूरा थाना ही सिर पर उठा लिया था। मैं चिल्‍ला रही थी कि मैंने आपको इतना बड़ क्‍लू दिया और आप उस पर आसन बिछाये इतने दिन से योगाभ्‍यास ही कर रहे हैं। वे लोग एक महिला पत्रकार द्वारा इतना बड़ा सीन क्रिएट किये के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। बेशक मेरी फाइल निकाली गयी थी। डेट्स देखे गये थे। तब पुलिस ने एक ही भेद खोला था कि बाकी दोनों मोबाइलों के सिम कार्ड बदले जा चुके हैं। मैं हैरान थी कि इन दोनों जानकारियों के मिलने के बाद भी पुलिस कुछ नहीं कर रही थी। न तो उसने कॉल किये गये नम्‍बर के मालिक का पता जानने की कोशिश की थी और न ही यह जानने की ही जहमत उठायी थी कि सिम कार्ड बदलने के बाद अब वे मोबाइल किसके पास हैं और मज़़े की बात, कई कई बार पूछने पर भी मुझे कोई बात नहीं बतायी गयी थी। मैं हैरान थी कि वे इतना महत्‍वपूर्ण सुराग दबाये बैठे थे, अब तक तो कुछ तो काम किया होता लेकिन मेरे शोर मचाने के बावजूद कुछ भी नहीं किया गया था। मैं दिल्ली से हर बार अलवर जाती लेकिन खाली हाथ लौटना पड़ता। मैं हर बार गिड़गिड़ाती और वे हर बार काम करने के अपने तरीके की दुआई देते रहे रहते। मैंने अनुरोध करके, गिड़गिड़ा कर, गुस्‍सा हो कर जतलाना चाहा कि मैं आपके काम करने के तरीके पर उँगली नहीं उठा रही। मेरा डर ये है कि एक एक दिन मुझे इसलिए भारी पड़ रहा है कि अब तक जैसे मेरे मोबाइल ठिकाने लगाये जा चुके हैं, मेरे लैपटॉप और हार्ड डिस्‍क कहीं ठिकाने लगा दी गयीं तो पहला काम यही किया जायेगा कि उन्‍हें फार्मेट किया जायेगा और मेरा सारा काम खत्‍म कर दिया जायेगा। मेरी बरसों की मेहनत एक ही क्‍लिक में चली जायेगी। लेकिन शायद वे हमारे पहले दिन के व्‍यवहार का बदला ले रहे थे।

अब हमने यही ठीक समझा था कि मोबाइल बिल ले कर उनके सिर पर जा बैठें। अब इस नम्‍बर का सच हमारे पास था और जरूरत पड़ने पर हम इस तुरुप चाल को चल सकते थे। वे अगर खुद कुछ नहीं करते तो हम खुद ही फोन करके सुषमा परीक का पता पूछें और उसके जरिये चोर तक पहुंचें। मैंने विपिन को भी साथ चलने के लिए राजी कर लिया था। वैसे भी वह तब से बेरोजगार ही था और पूरे केस में लगातार मेरे साथ बना रहा

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ट्रेन में चलते समय मैं लगातार उन घटनाओं के बारे में अनुमान लगा रही थी जो आगे जा कर होने वाली थीं। अजीब बात थी कि मुझे चोर पर तरस आ रहा था। मैं चाहने लगी थी कि वह अनपढ़ गंवार, जाहिल और काम चोर निकले। जैसा मेरे डेबिट और क्रेडिट कार्डों के साथ कुछ नहीं किया था उसने, बाकी सामान के साथ भी कुछ न किया हो। काश, वह कुछ भी बेच न पाये। मेरा पता ठिकाना है ही मेरे सामान में। आ कर सारा सामान दे जाये और जितने चाहे पैसे ले जाये। फिरौती की तरह। मैं कुछ भी नहीं कहूंगी। या फिर कैमरा रख ले, पैसे रख ले, कार्ड उसके किसी काम के नहीं, मोबाइल रख ले, बस मुझे मेरा बरसों की इतनी मेहनत से किया गया कीमती काम लौटा दे। मैं लगातार डर रही थी कि कहीं उसने लैपटॉप न बेच दिये हों और खरीदने वाले ने उन्‍हें आगे बेचने के लिए फार्मेट न कर दिया हो। उसे बेशक हार्ड डिस्‍क में कुछ एक्‍स्‍ट्रा स्‍पेस मिल जायेगा लेकिन….. यह लेकिन ही तब से मेरी जान खाये जा रहा था।   

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हमने दिल्‍ली से चलते समय ही तय कर लिया था कि इस बार पुलिस वालों से कोई बहस नहीं करेंगे बल्‍कि अपनी तरफ से मदद करने की ही पेशकश करेंगे। हमें पता था कि हमारी ये विजिट निर्णायक होगी। बेशक सामान न मिले उसका पता ठिकाना और हालत के बारे में तो कुछ न कुछ पता चलेगा ही। हम दोनों  ही ये मान कर चल रहे थे कि ये लड़की जरूर चोर की गर्ल फ्रेंड होगी। कोई एक एक घंटे या दो दिन में कम से कम किसी दोस्‍त से तो बात नहीं करता, बिजिनेस डील की बात अलग है।

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पुलिस वालों ने जब मोबाइल का बिल देखा तो अब उनके पास बनाने के लिए कोई  बहाना नहीं बचा था। वैसे भी हमने उनका ही काम आसान किया था। हमने उन्‍हें अपनी तरफ से कुछ नहीं  बताया था कि ये किसका नम्‍बर है। वे शायद पहले भी इस तरह का काम कर चुके थे। घंटे भर में  पुलिस वाला पूरी डिटेल्‍स ले आया था। मैंने प्रिंट आउट देखना चाहा तो उसने कागज मेरे आगे कर दिया। हम सही थे – सुषमा परीक। उम्र 21 बरस। मैंने मुंशीजी से पूछा – अब क्‍या करेंगे?

– करेंगे क्‍या, फुलेरा जायेंगे। वहां छोकरी को थाने बुलवायेंगे और चोर के बारे में पूछेंगे। आप फिकिर मत करो। ये हमारा रूटीन काम है।

– लेकिन मैं कुछ और सोच रही हूं थानेदार साहब।

उसने अपने हाथ का काम रोक कर मेरी तरफ देखा। इशारे से मेरी बात का मतलब पूछा।

– मेरा मतलब ये किसी भी लिहाज से ठीक नहीं होगा कि पुलिस सीधे लड़की के घर पहुंच जाये या लड़की को थाने बुलवाया जाये। इसमें उस बेचारी का क्‍या कसूर कि उसका बॉय फ्रेंड चोर है। हमें तो उसके माध्‍यम से चोर तक ही तो पहुंचना है। ये काम बिना लड़की के घर वालों को बिना बताये या हो हल्‍ला मचाये भी तो किया जा सकता है। छोटे शहर के मोहल्‍ले का मामला ठहरा। उसे बदनाम होते देर नहीं लगेगी।

– तो उससे क्‍या फर्क पड़ता है? हमने तो अपना काम करना है।

– फर्क पड़़ता है भइया। वो चोर ज़रूर इसका बॉय फ्रेंड होगा। पता नहीं लड़की को उसके चोर होने का पता भी है या नहीं। दूसरे आजकल लड़कियां अपने घर पर बता कर बॉय फ्रेंड थोड़े ही बनाती हैं।

– लेकिन हमें तो अपना काम करना ही है। आप ही के केस में तो कर रहे हैं।

– यही मैं कह रही हूं कि पुलिस वालों को देख कर लड़की के घरवालों और आस पड़ोस में सबको पता चल जायेगा कि एक चोर उसे फोन करता है। ठीक है कि हम उस लड़की से चोर के बारे में पता लगाने जा रहे हैं लेकिन ये काम हम लड़की को बदनाम किये बिना भी तो कर सकते हैं।

– तो आप ही बताओ हम क्‍या करें? बंद कर दें केस कि हम लड़की को बुला कर या उसके घर जा कर उससे पूछ ताछ नहीं कर सकते। आप तो जी हमें अपना काम करने दो।

– आप करो अपना काम लेकिन उसे इस मामले में उसके घर वालों के ही सामने बदनाम करने की ज़रूरत नहीं है। लड़की को ज्‍यों ही पता चलेगा कि वह आदमी चोर है और चोरी किये गये फोन से ही उससे इतनी बातें करता रहा है तो वह उससे नफरत ही करेगी और हमसे सहयोग ही करेगी।

– लेकिन ये होगा कैसे? उसका सवाल अपनी जगह पर था।

– मैं बताती हूं। क्‍या करेंगे। मैं पत्रकार हूं। जानती हूं ये काम कैसे किया जा सकता है। मैं अकेली जाऊंगी उसके घर और उससे किसी भी तरीके से अकेले ही बात करूंगी। उसके घर वालों को भी खबर नहीं होगी। ये मेरी गारंटी रही कि उससे चोर के बारे में जानकारी ले कर ही आऊंगी।

– और अगर उसने आनाकानी की तो?

– तो मैं आपके काम करने के तरीके में रुकावट नहीं डालूंगी।

ड्यूटी पर पुलिस वाला पूरी तरह से तो नहीं लेकिन कुछ हद तक सहमत हो गया है। उसके जूनियर ने भी मुझसे सहमति जतायी है।

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अलवर की रेलवे पुलिस ने अपनी सारी औपचारिकताएं पूरी की हैं, फुलेरा जंक्‍शन के रेलवे थाने और वहां की पुलिस चौकी को खबर दी है और दो पुलिस वालों के साथ हम अगली गाड़ी से फुलेरा जंक्‍शन के लिए चल पड़े हैं। वहां पहुंच कर पुलिस वाले अपनी औपचारिकताओं में लग गये हैं और तय प्रोग्राम के अनुसार मैं जरूरी कागजात ले कर अकेली ही सुषमा परीक के घर गयी हूं। घर आसानी से मिल गया है। साधारण सा घर। दरवाजा उसके भाई ने खोला है। मैंने पत्रकार के रूप में अपना परिचय दिया है और एक सर्वे के सिलसिले में सुषमा के लिए पूछा है।

भाई ने अंदर आने के लिए कहा है और सुषमा को बुलाया है। सुषमा आयी है। साधारण कद काठी की एक अति साधारण लड़की। मन में आया है – ऐसी लड़की किसी चोर की प्रेमिका ही हो सकती है। उसने मुझे उत्‍सुकता से देखा है। मैंने फिर पत्रकार के रूप में परिचय दिया है और एक सोशल समस्‍या पर कुछ सवाल पूछने की अनुमति चाही है। वह तैयार हो गयी है लेकिन उसका भाई भी वहीं जम कर बैठ गया है। आखिर मुझे कहना पड़ा है कि मैं सुषमा से कुछ ऐसे सवाल पूछने वाली हूं जिनके शायद वो तुम्‍हारे सामने जवाब न दे पाये।

भाई अजीब से मुंह बनाता हुआ परदे के पीछे चला गया है लेकिन उसके जाते हुए कदमों की आहट ने बता दिया है कि वह दूसरे कमरे में उतनी ही दूर गया है कि छुप कर हमारी बातें सुन सके। छोटे शहर की मिडल क्‍लास मेंटैलिटी।

मैंने इस बात की परवाह किये बिना और बिना कोई भूमिका बांधे मोबाइल कंपनी से आयी लिस्‍ट उसके सामने कर दी है और कहा है – मुझे तुम्‍हारा मोबाइल नम्‍बर पता है और मुझे इस नम्‍बर से तुम्‍हें फोन करने वाले आदमी का नाम और पता चाहिये।

वह सूची देख कर ही घबरा गयी है। उसके चेहरे का रंग उड़ गया है और वह हकलाने लगी है – ये तो मेरा नम्‍बर नहीं है और मैं इस नम्‍बर वाले आदमी को भी नहीं जानती।

मैंने उसे प्‍यार से समझाया है – देखो सुषमा। मैं जानती हूं कि तुम इस नम्‍बर वाले आदमी को नहीं जानती क्‍योंकि ये नम्‍बर मेरा है। मैं उस आदमी के बारे में जानना चाहती हूं जिसने इस नम्‍बर से तुम्‍हें फोन किये।

– लेकिन मुझे तो किसी ने कोई फोन नहीं किये। कई बार रांग नम्‍बर आ जाते हैं।

– सच कह रही हो?

– लेकिन आप क्‍यों जानना चाहती हैं? उसके चेहरे पर अभी भी प्रश्‍न चिह्न टंगा हुआ है।  उसने पल्‍लू से पसीना पोंछते हुए कहा।

– क्‍योंकि ये नम्‍बर मेरा है और मेरे सारे सामान के साथ तीन मोबाइल भी चोरी हुए हैं। जिसने सामान चुराया है उसने इस नम्‍बर से तुम्‍हें 21 बार कॉल किया है और दो बार एक एक घंटे की कॉल की गयी है। और एक एक घंटे तक रॉंग नम्‍बर पर बात नहीं की जाती। हमें तुमसे कुछ नहीं चाहिये, बस इस आदमी का नाम और पता बता दो।

वह घबरा गयी है। रोने लगी है। उसे डर भी है कि कहीं भाई न सुन ले। फिर भी उसने आखिरी कोशिश की है – दरअसल मेरा मोबाइल पिछले दिनों चोरी हो गया है। ये कॉल्‍स मेरे पास नहीं आये।

मैंने उसे समझाने की कोशिश की है – देखो सुषमा, एक चोर को बचाने की कोशिश तो करो मत। बेशक तुम्‍हारा दोस्‍त हो। वो चोर है जो चलती ट्रेन से मेरा कई लाख का सामान चुरा कर अभी भी आराम से घूम रहा है। मेरा सब कुछ लुट चुका है। मेरा ये मोबाइल भी उसी के पास है और इसे इस्‍तेमाल कर रहा है। मुझे बाकी कीमती सामान का पता लगाना है। मुझे चोर में कोई दिलचस्‍पी नहीं। मुझे मेरा सारा सामान वापिस चाहिये।

वह फिर हकलायी – लेकिन मेरा मोबाइल तो कब से गुम हो चुका है।

मैंने एक और आखिरी और अचूक दांव चला – देखो तुम्‍हारा नम्‍बर मेरे पास है। मैं अभी अपने मोबाइल से तुम्‍हारा नम्‍बर डायल करती हूं। अभी बजेगा भीतर के किसी कमरे में ये मोबाइल और तुम्‍हारा भाई ले के आयेगा – सुषमा तुम्‍हारा फोन। ये तो तय है कि उसके नाम की जगह तुमने किसी सहेली का नाम डाला होगा। तब मेरे लिए तुम्‍हारे भाई के सामने सच बोलने और सच उगलवाने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा।

इतना सुनते ही वह रोने लगी है और मुझे हाथ के इशारे से चुप रहने का इशारा किया है। मेरी तरफ याचना भरी निगाह से देखा है। मेरे चेहरे की सख्‍ती देख कर वह घबरा गयी है – हम बाहर चलें क्‍या?

– हां, एक काम करो, मेरे साथ जरा स्‍टेशन तक चलो। स्‍टेशन पर मेरा सामान रखा है। वहीं बात करते हैं। फिर तुम वापिस आ जाना।

वह अंदर की तरफ गयी है। तय है, पर्स और मोबाइल लेने। आते आते उसकी आवाज आयी है – भइया, जरा इन्‍हें स्‍टेशन तक छोड़ कर आती हूं। जरा दरवाजा बंद कर लेना।

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हम दोनों बाहर गली में आये तो सुषमा ने दबी सहमी आवाज़ में कहा है – लेकिन वो तो बता रहा था कि ये फोन उसे आधी रात को सड़क पर पड़ा मिला था?

तो अब आयी लाइन पर। पूछा मैंने कि कब की बात है तो बताया – जब उसने पहली बार इस नम्‍बर से फोन किया था।

मैंने उसका नाम पूछा तो वह घिघियायी- जी जी वो ..

मैंने ढाढस दिलाया – घबराओ नहीं, तुम्‍हारा नाम कहीं नहीं आयेगा। फिर मैंने उसका मनोबल बनाये रखने के लिए उससे व्‍यक्‍तिगत सवाल पूछने शुरू कर दिये हैं। जरूरी जवाब वह पुलिस वालों के सामने दे तो ही बेहतर। इस बीच मैंने विपिन को फोन पर बता दिया है कि मैं लड़की को ले कर आ रही हूं। स्‍टेशन पहुंचने से पहले मैंने सुषमा को बता दिया है कि उसे सारी बातें पुलिस वालों के सामने बतानी होंगी और वह बिल्‍कुल भी न घबराये। उसका नाम कहीं नहीं आयेगा और न ही उसके घर वालों को पता चलेगा। लेकिन सुषमा अभी भी बहुत घबरायी हुई है। मैंने उसका कंधा थपथपा कर दिलासा दी है।

मैंने स्‍टेशन के  पुलिस थाने में पहुंचते ही पुलिस वालों को इशारा किया – यही है जिसके नम्‍बर पर फोन किये गये थे। अपने आपको स्‍टेशन पर पुलिस के थाने में पा कर सुषमा रोने रोने को है लेकिन उसे पता चल चुका है कि अब बिना नाम और पता बताये कोई उपाय नहीं।

मैंने उसे पुलिस वालों को  सौंप दिया है। सबसे पहले उससे चोर का नाम पूछा गया।

उसने रोते रोते बताया – संतोष नाम है उसका।

– कैसे जानती हो उसे?

– पहले हम उसी मोहल्‍ले में रहते थे। पास में रहता था।

– करता क्‍या है?

– ड्राप आउट है। नौंवीं तक हमारे साथ पढ़ा।

– तुम्‍हारी पढ़ाई?

– बारहवीं के बाद छोड़ दी।

– अब क्‍या करती हो?

– घर पर ही रहती हूं।

– आखरी बार वह कब मिला था?

– कई दिन हो गये, बीच में मेरी तबीयत खराब थी।

– फोन कब किया था उसने आखिरी बार?

– तीन दिन पहले।

– किस नम्‍बर से?

– अपने वाले नम्‍बर से।

– उसका अपना नम्‍बर बताओ।

सुषमा ने अपने मोबाइल से देख कर बता दिया है।

– तुमने कब किया था फोन उसे?

– मैं नहीं करती, वही करता है। जब बात करने का मौका होता है तो मैं मिस कॉल देती हूं। वही बात करता है।

– इस समय कहां मिल सकता है?

– घर पर ही होना चाहिये, वैसे पता नहीं, कोई काम धाम नहीं करता।

वह मेरी तरफ देख कर अचानक रोने लगी है- दीदी उसे मैंने पकड़वाया है, या मैं उसे जानती भी हूं ये बात कहीं नहीं आनी चाहिये। नहीं तो मेरे घर वाले मुझे मार डालेंगे।

– नहीं, तुम्‍हारा नाम कहीं नहीं आयेगा। तुम तो हमारी मदद ही कर रही हो।

– कोई खास बात? अगला सवाल।

– वो वो दरअसल.. वह कहते कहते रुक गयी है।

– हां हां बोलो।

– वह वही वाला मोबाइल मुझे देना चाहता था। उसने यही बताया था कि सड़क पर पड़ा हुआ मिला है।

      – तो लिया क्‍यों नहीं?

      – घर पर क्‍या बताती कि इतना महंगा मोबाइल कहां से ले लिया।

      – कौन सा मॉडल था?

      – पता नहीं लेकिन सैमसंग का काफी महंगा मॉडल था।

      ये सुन कर पुलिस वाले ने मेरी तरफ देखा – मैंने सिर हिला कर बताया – हां, मेरा ही होना चाहिये

      पुलिस का काम हो चुका था। सुषमा को इस हिदायत के साथ जाने दिया गया कि वह भूल कर भी हमारी मुलाकात का जिक्र संतोष से न करे। न ही उसे कुछ बताये। अगर वह आज हाथ में नहीं आया तो हम तुम्‍हारे घर फिर से आ धमकेंगे और तब इस मैडम की एक ना चलेगी।

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       हमें रात वहीं ठहरने के लिए कह दिया गया। एक मामूली सा होटल ही हमें मिल पाया। रात दस बजे पुलिस का फोन आया कि संतोष को पकड़ लिया गया है। हमें तुरंत बुलाया गया था। विपिन और मैं तुरंत लपके। मैं दुआ कर रही थी कि मेरा सारा सामान यही सलामत मिल जाये। हमारे वहां पहुंचने तक चोर की पिटाई का एक दौर पूरा हो चुका था। बीस बाइस बरस का मरियल सा लड़का। मार खाने के बाद वैसे ही हुलिया बिगड़ा हुआ था। हमें देखते ही वह रोने लगा। समझ गया कि मेरे ही सामान की चोरी के इल्‍जाम में उसे धरा गया है। अपने आपको बेकसूर बताता रहा। अब तक की पिटाई के बाद उसने इतना ही उगला था कि कुछ सामान उसे बरसात की रात में सड़क पर पॉलिथीन की थैली में बहुत भीगी हुई हालत में मिले थे। एक मोबाइल और लैपटॉप उसने रख लिये थे और बाकी सामान टूटा फूटा समझ कर उसने फेंक दिया था। ये सुनते ही मेरी तो जैसे जान ही निकल गयी। लगा, बेहोश होकर गिर ही जाऊंगी। पता नहीं ये असली चोर है भी या नहीं। सुषमा भी कुछ ऐसा ही बता रही थी।

       तभी थाना इंचार्ज ने मुझे बुलाया और ड्रावर से एक मोबाइल निकाल कर दिखाया – ये आपका है क्‍या। इसकी जेब से निकला है। मैंने लपक कर मोबाइल उठाया और अपने माथे से लगाया। ओह गॉड। मेरे खोये सामान की पहली आइटम। मोबाइल की एड्रेस लिस्‍ट देखी। इमेजेज देखी। एकदम हताश हो गयी। सब कुछ डिलिट किया जा चुका था। मैंने उस मोबाइल से अपना नया नम्‍बर डायल किया। नम्‍बर बदला जा चुका था। मिसयूज के कारण दो महीने में ही मेरा कीमती मोबाइल सदियों पुराना लगने लगा था। मैंने कुछ और फोल्‍डर चेक किये।  हां, कुछ फाइलें मिल ही गयीं। मैंने कन्‍फर्म किया – हां, ये मेरा ही है। लेकिन मेरा बाकी सामान? वो तो बता रहा है सड़क पर बरसात में मिला और बाकी सामान फेंक भी दिया। मैं बेसब्री हुई जा रही थी।

    – सब बतायेगा, जरा धीरज धरें। अभी तो एक ही डोज मिली है उसे। चोर इतनी आसानी से सारी बातें नहीं बताते। कई कई दिन लग जाते हैं तब कुछ पता चलता है या हाथ लगता है। कल इसके इलाके के थाने में इसकी हिस्‍टरी शीट निकलवायेंगे तो पता चलेगा। पुराना खिलाड़ी है या नया। अभी आप जायें। आप कल दिन में आना। तब तक देखें क्‍या हाथ लगता है।

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     सुबह आठ बजे ही पुलिस वालों का बुलावा आ गया। मैं हैरान भी हुई कि क्‍या उसने सारा सच उगल दिया है या सामान का पता बता दिया है। दुविधा में थी कि क्‍या हो सकता है लेकिन थाने में दूसरी ही कहानी हमारा इंतज़ार कर रही थी। बताया गया कि चोर मुझसे अकेले में बात करना चाहता है। मैं जब उसके पास गयी तो उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि पुलिस वालों से कह कर थोड़ी देर के लिए उसकी जंजीर खुलवा दें। तब मैंने पहली बार देखा कि उसके पैर से एक जंजीर बंधी हुई थी और जंजीर का दूसरा सिरा दीवार में लगी एक कड़ी से बंधा हुआ था। मुझे लगा कि अगर वह सच बताने को तैयार हो तो इतनी रियायत तो उसके साथ की जा सकती है।

       जंजीर खुलने के बाद उसने अपने हाथ पैर सीधे किये। दो मिनट तक आंखें बंद कीं और कहने लगा – दीदी, मैं सचमुच में चोर नहीं हूं। मुझे ये सामान सड़क पर एक पालिथीन की थैली में मिला था। आप मेरा भरोसा करें मैडम। ये पुलिसवाले मुझे मार डालेंगे। मेरा कैरियर तबाह हो जायेगा। प्‍लीज मुझे बचा लें। वह ज़ार ज़ार रोने लगा। मेरे पैरों पर गिरने लगा।

       मैंने डांटा – पहले तो ये दीदी वीदी का नाटक बंद करो। सच सच बताओ मेरा सारा सामान कहां है। सच बताओगे और मेरा सामान वापिस दिलवाओगे तो मैं देखूंगी कि तुम्‍हें कोई सज़ा न मिले। मुझे मेरे अपने कीमती सामान से मतलब है।

       –  मेरा यकीन करो मैडम, मैं सच में चोर नहीं। मैं तो खुद पुलिस की नौकरी के लिए कोशिश कर रहा हूं। एप्‍लाई भी कर रखा है। मुझे ये मोबाइल और लैपटॉप ही सड़क पर मिले थे। बाकी सब कुछ बरसात में खराब हो गये थे तो वहीं फेंक दिये थे।

       – तुम जिसे बेकार समझ कर फेंकने की बात कर रहे हो वह हार्ड डिस्‍क थी। तुम नहीं जानते संतोष तुमने मेरा कितने करोड़ों का नुक्‍सान किया है। मैं इस चोरी के बाद सड़क पर आ गयी हूं। मेरा घर बार सब बिक गया है। दोनों लैपटॉप और कैमरा वगैरह कहां है? 

      – सिर्फ लैपटॉप था। वो तो मैंने बेच दिया था। वो मैं पुलिस को बता दूंगा।

      – तुम्‍हें पता है मेरा क्‍या क्‍या चोरी हुआ है जिसे तुमसे बरामद कराया जायेगा।

      – मैं सच कह रहा हूं मैडम, मुझसे ऐसी चोरी कर सामान कैसे बरामद कराया जा सकता है जो मैंने की ही नहीं।

      अब मुझे भी गुस्‍सा आने लगा है। सच है लातों के भूत..। मैंने बताया उसे – दो लैपटॉप, एक कैमरा, अलग अलग लेंसों का सेट, तीन मोबाइल, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, लाइसेंस, आधार कार्ड, पैन कार्ड, पैन ड्राइव, वॉइस रिकार्डर और 1000 जीबी की एक एक्‍सटर्नल हार्ड डिस्‍क। हैड फोन, ईयर फोन तथा कुछ और छोटे मोटे सामान।

     – सच मानिये, मैं चोर नहीं हूं, मेरा कैरियर तबाह..

     – कितना पढ़े और क्‍या करते हो? मैंने उसी से सच्‍चाई उगलवानी चाही।

     – बारहवीं पास हूं। जॉब तलाश कर रहा हूं, .. पुलिस…

     मतलब झूठ बोल के मेरी हमदर्दी लेना चाहता है। सुषमा बता रही थी, नवीं का ड्राप आउट  है। ये खुद को बारहवीं पास बता रहा है। मैं उठ खड़ी हुई हूं – सच बोल के मेरा सारा सामान वापिस दिलवाओगे तो पुलिसवाले बनोगे और झूठ बोलोगे तो राम सिंह जैसा हाल होगा।

    – क क कौन राम सिंह, वह घबरा गया है।

    – वही राम सिंह जिसने दिल्‍ली में दामिनी के साथ चलती बस में सामूहिक बलात्‍कार किया था और जेल में दूसरे कैदियों ने उसी के साथ अप्राकृतिक सैक्‍स करके उसे आत्‍म हत्‍या के लिए मजबूर किया। चाइस इस यूअर्स कह कर मैं बाहर आ गयी हूं।

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     रेलवे पुलिस को लोकल थाने से उसके खिलाफ कुछ नहीं मिला है। अलबत्‍ता उस थाने में भेजे जाने से पहले उसकी कुटाई के कई दौर चले और उसने उन दोनों दुकानदारों के नाम भी बता दिये हैं जिन्‍हें उसने लैपटॉप और दूसरा मोबाइल किसे बेचे थे। उसी रात वे दोनों भी धर लिये गये हैं। लेकिन बाकी सामान के बारे में वह साफ मुकर गया है। बार बार मार खाते हुए भी यही कहता रहा कि जो भी सामान मिला था वह बरसात में सड़क पर ही मिला था। हार्ड डिस्‍क के बारे में यही कहता रहा कि कुछ था तो सही लेकिन उसे पता नहीं था कि ये हार्ड डिस्‍क होती है। बेकार समझ कर उसने उसे वहीं फेंक दिया था। अलबता वह इस बात का जवाब नहीं दे पाया है कि इतनी बरसात में दोनों मोबाइल और लैपटॉप ठीक हालत में कैसे रह गये। उसे जेल भेज दिया गया है।

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       मैं अवाक हूं। कुछ भी नहीं सूझ रहा कि चोर के पकड़े जाने की इतनी रोमांचक यात्रा के बाद मुझे खुश होना चाहिये या जोर जोर से रोना चाहिये क्‍योंकि जिसने लैपटॉप खरीदा था वह न केवल उसकी फार्मेटिंग कर चुका है बल्‍कि उसकी कन्‍फिग्रेशन भी बदल चुका है। अब वह मेरा कीमती लैपटॉप नहीं, कबाड़ी की दुकान पर बिक रहा एक साधारण सा लैपटॉप रह गया है। दूसरा मोबाइल भी जिस हालत में मुझे दिखाया गया है, न ही दिखाया जाता तो बेहतर रहता। ये सामान भी मुझे अदालतों में बीसियों तारीखें भु्गतने के बाद ही मिलेंगे। इसमें 6 महीने भी लग सकते हैं। अब तक हजारों रुपये अलवर और फुलेरा तक आने जाने और यहां ठहरने के खर्च कर चुकी हूं।

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     इस बीच मैं अपनी शराफत का परिचय देते हुए एक और धोखा खा चुकी हूं। चोर के ही हाथों। अब तक का सबसे बड़ा हादसा।

    चोर कम से कम बीस दिन से जेल में था। मुझे दो बार पुलिस के बुलावे पर अदालती कार्रवाई के सिलसिले में अलवर जाना पड़ा था। तभी अचानक एक दिन मेरे दिल्‍ली वाले घर में एक आदमी आया और मेरे हाथ में मेरा ड्राइविंग लाइसेंस थमा दिया। अरे, ये तो ट्रेन में चोरी गये बैग में था। इसके पास कहां से आया।

      पूछने पर बताया उसने कि वह संतोष का भाई है। संतोष के सामान में ये लाइसेंस मिला जिस पर लिखे पते पर वह यहां तक पहुंचा है। वह संतोष से कह सुन कर बाकी सामान और पेपर्स भी बिना पुलिस को बीच में लाये बरामद करवा देगा अगर..

   – अगर क्‍या.. मैं आगे सोच भी नहीं पायी।

     – अगर मैं संतोष की जमानत करवा दूं।

    मैं तो अपना सामान किसी भी कीमत पर वापिस पाने के लिए जैसे उतावली हो रही थी। चल दी उस बंदे के साथ अलवर। उस दिन विपिन शहर में नहीं था लेकिन एकाध दिन में आ जाने वाला था। मैं इतनी बेसब्री हो चली थी कि एक दिन के लिए भी उसका इंतजार नहीं किया और न ही उससे फोन पर सलाह ही ली।

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      इधर मैंने संतोष की जमानत करवायी और उधर उसका भाई साफ मुकर गया कि उसने मुझसे ऐसा कोई वायदा ही किया था।

     मैंने अपने हाथों से ही अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार ली है।

     अब किस मुंह से अदालत या पुलिस के पास जाऊं।

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