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उपन्यास पर बात – प्रेम पगे दो शब्द

एक नायक है और एक नायिका है। ये ऐसे वैसे नहीं हैं जैसे हम हर दूसरी फिल्म में और तीसरी प्रेम कहानी में देखते हैं। नायिका रिटायर्ड टीचर हैं और नायक रिटायर्ड अहलकार। दोनों पति-पत्नी हैं। कई बरस पहले उनका विवाह हुआ था, इतने पहले कि उनका बेटा प्रशांत पढ़ाई करके विदेश में बसा हुआ है और वहीं उसने विवाह भी कर लिया है।

नायक-नायिका बेशक पति-पत्नी हैं, पर वे दोनों इस रिश्ते में इतने औपचारिक हैं कि पतिदेव अपनी पत्नी को उमा जी कह कर बुलाते हैं। इस संबोधन से ही आप समझ गए होंगे कि दोनों के रिश्ते में कितना कुछ अनकहा और अनसुना रह गया होगा।

पतिदेव समय गुजारने के लिए वकीलों के लिए ड्राफ्ट बनाते रहते हैं और उमा जी जो हैं, वे पति की जरूरतें पूरी करने बाद बचे समय में प्रेम कहानियां पढ़ती रहती हैं और उन कहानियों में आए किस्सों से खुद की तुलना करती रहती हैं। इस बहाने वे अपने स्कूल के दिनों की एक सहेली के जीवन के अधूरे प्रेम को भी याद करती हैं।

वे खुद को देखती हैं और सोचती हैं कि काश उन्हें भी किसी ने प्रेम किया होता। पतिदेव ने उनके प्रति पूरी तरह समर्पित होते हुए भी प्रेम के दो बोल नहीं बोले और वे खुद पति के प्रति आस्थावान होते हुए भी कभी पति से अपने मन की भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं कर पाईं। घर की जरूरतों को पूरा करने में ही उनका पूरा जीवन चला गया। पतिदेव हैं कि अभी भी अपने कामकाज के सिलसिले में सारा दिन व्यस्त रहते हैं। पति की जरूरतें पूरी करने के बाद उमा जी के पास समय ही समय है, जिसमें उन्हें प्रेम कहानियां पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। इसकी वजह यह भी है कि उन्हें ना तो कभी किसी ने प्रेम किया और ना ही वे किसी के प्रेम में पड़ पाईं। उनकी बचपन की एक सहेली जरूर प्रेम में पड़ गई थी और उसका अंजाम बुरा ही हुआ था।

उमा जी जो भी प्रेम कहानी पढ़ती हैं उसे खुद से या अपनी सहेली से जोड़कर देखती हैं। अगर ऐसा हुआ होता तो क्या हुआ होता, अगर वैसा हुआ होता तो क्या हुआ होता। तभी उनकी ज़िंदगी में बदलाव आता है। अध्यापन के दिनों में उनके साथ काम करने वाला एक रिटायर्ड अध्यापक उनसे फोन पर बात करता है, धीरे-धीरे उनके मन को टटोलता है और उन्हें मित्र बनाने का प्रस्ताव रखता है। उमा जी घबराती हैं कि इस उम्र में यह सब क्या हो रहा है, लेकिन उनका जीवन इतना नीरस और प्रेमविहीन है कि वे इस प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं कर पातीं और धीरे-धीरे पहले लैंडलाइन और फिर मोबाइल पर उनकी बातें होने लगती हैं। ये महोदय अपनी बातों के जरिए उमा जी के दिलो-दिमाग की खाली जगहों पर और उनकी अधूरी हसरतों पर अपना कब्जा जमाने लगते हैं। उमाजी उनकी प्रेम-पगी बातों से प्रभावित होती हैं और उनके संदेशों का इंतजार करने लगती हैं। यह मामला इतना आगे बढ़ जाता है कि वे पति से छुपाने के लिए उसका फोन नंबर भी अपनी सहेली के नाम से सेव कर लेती है। एक-दो बार पति शक भी करते हैं, पर उमा जी बहाना बना कर टाल जाती हैं। वे जानती हैं कि यह सब करने की उनकी उम्र नहीं है, लेकिन प्यारभरे बोलों का आकर्षण इतना बड़ा होता है कि वे जोखिम लेती रहती हैं। ये महोदय उन्हें मोहब्बतभरे संदेश फारवर्ड करते रहते हैं, जरा बानगी देखिए

– ओ. के. अब मैं आपको गुडमॉर्निंग और गुडनाइट जैसे संदेश भेज सकूंगा, यह तो बहुत अच्छा हो गया।

– आपकी सादगी और भोलेपन में अद्भुत सौंदर्य है।

– दोस्ती और अच्छे संबंधों के लिए खूबसूरत आवाज और खूबसूरत चेहरे का होना जरूरी नहीं है, इसके लिए चाहिए खूबसूरत दिल और न टूटने वाला विश्वास।

– ज़िंदगी का सबसे लंबा सफर एक मन से दूसरे मन तक पहुंचने का होता है और इसी में सबसे ज्यादा समय लगता है।

– ज़िंदगी बहुत तेजी से गुजरती है, इसका एक-एक क्षण कीमती है। हर पल को जीना और उसका आनंद उठाना चाहिए। कोई भी उम्र किसी भी काम के लिए गलत उम्र नहीं हो सकती। नए रास्ते और नए तरीके ढूंढ़ने में उम्र कभी आड़े नहीं आती। मुख्य चीज यह है कि जिस चीज में, जिस बात में हमें खुशी मिले उसे अंगीकार करें। हां, किसी भी गलत काम के लिए तो हर उम्र गलत है।

– रूहानी प्यार की पवित्रता को दैहिक प्यार के क्षणिक सुख के तराजू में रख कर नहीं तोला जा सकता। ज्ञान और सूचना का अंतर समझ आना चाहिए।

– सच्चा दोस्त मिलना किस्मत की बात होती है, ऐसा दोस्त आपके दिल पर अपने कदमों के न मिटने वाले निशान छोड़ता है और आप कहीं भी रहें उसकी याद हमेशा आपके साथ रहती है।

– मीठी जुबान, अच्छे व्यवहार, खुशमिजाज और दूसरे के मन की बात आसानी से समझ लेने वाले लोग किसी के भी दिल में सहज ही जगह बना लेते हैं, जैसे आप।

– क्या प्यार को जिंदा रखने के लिए रोमांस और शारीरिक निकटता जरूरी है? क्या सिर्फ बातों के बल पर प्यार को जिंदा रखा जा सकता है?

यह सब चल ही रहा था कि उनके बेटे का अमेरिका से बुलावा आ जाता है, वे वहां जाने की तैयारी के साथ यह भी सोचती जाती हैं कि वे उन अध्यापक महोदय से संपर्क किए बिना वहां इतने दिन कैसे गुजार पाएंगी।

लेकिन जो होना होता हे, वही होता है। आगे क्या होता है, मैं यहीं अपनी बात समाप्त करते हुए आपके लिए छोड़ देता हूं ताकि आप खुद पढ़कर उसका आनंद उठा सकें।

यह उपन्यास चालीस वर्ष पुराने मेरे मित्र, सहकर्मी और एक तरह से मेरे बड़े भाई डा. रमाकांत शर्मा ने लिखा है। वे अब तक लगभग 75 कहानियां लिख चुके हैं। उनके चार कहानी संग्रह, एक व्यंग्य संग्रह, दो उपन्यास और एक अनूदित कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। बैंकिंग, प्रबंधन और अर्थशास्त्र जैसे विषयों पर भी उनकी 7 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।

उनकी पहली कहानी 1962 में बहुत छोटी उम्र में उस समय की सबसे लोकप्रिय बाल-पत्रिका “पराग” में प्रकाशित हुई थी।  उन्होंने जब बड़ों के लिए लिखना शुरू किया तो पहली कहानी 1986 में “नवनीत’ में प्रकाशित हुई। वे कुशल अनुवादक हैं और बहुत विनम्र, मिलनसार और शांत व्यक्ति हैं और यही बात उनकी रचनाओं के पात्रों पर भी लागू होती है।

शुरू में वे आदर्श बाल-कहानियां लिखते थे जिनमें अच्छे बच्चे हाथ पकड़कर स्कूल जाते हैं, फिर परिवार के त्याग की कहानियां जिन्हें पढ़कर हम पात्रों के साथ एकाकार होकर रोने लगें। उनकी कहानियों में खलनायक नहीं होते थे, अगर होते भी थे तो उनका अंजाम बुरा होता था। उनकी कहानियों में हमेशा एक संदेश हुआ करता था। लेकिन यह पहली बार हुआ है कि अपना लेखन शुरू करने के 35 वर्ष बाद उन्होंने एक बोल्ड उपन्यास लिखा है और वह भी सोशल मीडिया के प्रभाव, दुष्प्रभाव को सामने रखकर।

उपन्यास “छूटा हुआ कुछ” एक बेहद पठनीय उपन्यास है। यह हमें बताता है कि सोशल मीडिया बेशक हमारी ज़िदगी में आकर हमारे बहुत सारे खाली खाने भरता है, लेकिन उसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हैं। वह हमारे संबंधों को किस तरह तहस-नहस कर जाता है और हमें पता भी नहीं चलता कि हम कहां से शुरू करके कहां पहुंच गए हैं। रमाकांत जी ने यह बात बड़े मेच्योर तरीके से और बिना सलाहकार बने बताई है और यही उनकी खासियत है।

मैं उन्हें इस बात के लिए बधाई देना चाहूंगा कि उन्होंने इस विषय को अपने उपन्यास की कथावस्तु का आधार बनाया है और उसे आगे बढ़ाया है। निस्संदेह वे एक बेहतरीन उपन्यास लेकर हमारे सामने उपस्थित हुए हैं। वे इस उपन्यास के जरिए बिना कोई संदेश दिए, बिना कोई आदर्श हम पर थोपे स्थितियों के जरिए हमें बताना चाहते हैं कि आखिर वह परिवार ही होता है, वे अपने रिश्ते ही होते हैं जो अंत तक हमारे साथ चलते हैं। बाहर के आकर्षण कितने भी बड़े हों, वे बाहर के ही होते हैं और हमारा हाथ थामकर जीवनभर साथ नहीं चल सकते।

मैं विश्वास करता हूं कि रमाकांत जी इस गति को बनाए रखेंगे और भविष्य में और भी बेहतरीन लेखन के साथ हमारे सामने आएंगे।

आमीन

सूरज प्रकाश

[email protected]

15 जुलाई 2020

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