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डॉगीज़ बीमार हैं
Opinion

डॉगीज़ बीमार हैं

डॉक्टर साहिबा के डॉगीज़ बीमार हैं। नहीं नहीं , कुत्ते नहीं। डॉगीज़। डॉगी डॉगी ही होता है और कुत्ता तो होता ही कुत्ता है।  दरअसल कुछ ही भाग्यशाली कुत्ते डॉगीज़ की श्रेणी में आते हैं। आप डॉगी को कुत्ता प्रजाति का होते हुए भी उसे कुत्ता नहीं कह सकते। उन्हें उनके नाम से ही पुकारा जाता है। कुत्ता, कुतिया या कुत्ते का पिल्ला कहने पर वे तो नाराज़ होंगे ही, उनके मालिक हो सकता है आपसे संबंध ही तोड़ लें। आप किसी कुत्ते को तो डॉगी कह सकते हैं लेकिन डॉगी को कुत्ता हरगिज नहीं कह सकते। 

आप टोकना चाहेंगे कि भई डॉगी भी तो कुत्ते ही होते हैं। अपनी जात में भी और व्यवहार से भी। लेकिन नहीं साहब। दोनों में बहुत फर्क है। आइये बताते हैं। कुत्ता देसी होता है। घरेलू भी होता है और लेंडी या आवारा भी होता है। नंगापन उसका स्थायी भाव होता है। उसका कोई नाम नहीं होता। आप उसे मोती, शेरू या बहुत हुआ तो टॉमी जैसे घरेलू नाम से पुकार सकते हैं। आप उसे जिस नाम से भी पुकारें वही उसका नाम हो जाता है। गली मोहल्लों में रहने वाले ज्यादातर कुत्तों के तो कोई नाम ही नहीं होते। वे आजीवन बिना नाम के रह जाते हैं और कुत्ते और कुत्ते के पिल्ले के सर्वनाम के साथ ही मर जाते हैं। इसके विपरीत डॉगी खास होता है और उसका एक खास नाम होता है। ये नाम आम तौर पर विदेशी ही होता है। मार्शल, जिनी, स्वीटी, ब्रूनी या फ्लॉपी जैसे नाम होते हैं इनके।

कई बार तो ये नाम इतने खूबसूरत होते हैं कि पता ही नहीं चलता कि ये नाम मालकिन की बेटी का है या डॉगी का। कुत्ते भौंकते हैं जबकि डॉगी गुर्राते हैं। वे शक्ल सूरत और हाव भाव से भी खास होते हैं।

कुत्ते की कोई कीमत नहीं होती। वह यूं ही आजीवन मुफ्त में ही पलता है या कहीं भी भटकता या दुत्कारा जाता है। लतियाया जाता है। आप डॉगी को लात मार ही नहीं सकते। कुत्ता आप किसी से भी सेंत मेंत में ले दे सकते हैं। कोई भी पाल ले या छोड़ दे। कई बार उसका कोई माई बाप ही नहीं होता, लेकिन डॉगी का बाकायदा प्राइज़ टैग होता है। डॉगी बिकते और खरीदे जाते हैं। जैसे अमीर लोग अपने बच्चे के जन्म से पहले ही किसी पब्लिक स्कूल में उसका एडमिशन करा लेते हैं ठीक उसी तरह से जब कोई डॉगिन गर्भवती (यहां यह शब्द जानबूझ कर लिखा गया है) होती है तो उसके होने वाली संतानों की बुकिंग अच्छे खासे दामों पर पहले ही हो चुकी होती है। 

डॉग्स अमूमन बहुत महंगे होते हैं। उन्हें खरीदने से ज्यादा खर्चीला उनका लालन पालन होता है। हर कोई डॉग पालना एफोर्ड नहीं कर सकता। कुत्ता अपने आप पल जाता है। आम तौर पर कुत्ते लावारिस होते हैं। उनका कोई घर बार नहीं होता। कहीं भी सो लेते हैं ठीक उसी तरह से जब कोई डॉगिन गर्भवती (यहां यह शब्द जानबूझ कर लिखा गया है) होती है तो उसके होने वाली संतानों की बुकिंग अच्छे खासे दामों पर पहले ही हो चुकी होती है। डॉग्स अमूमन बहुत महंगे होते हैं। उन्हें खरीदने से ज्यादा खर्चीला उनका लालन पालन होता है। हर कोई डॉग पालना एफोर्ड नहीं कर सकता। कुत्ता अपने आप पल जाता है।

आम तौर पर कुत्ते लावारिस होते हैं। उनका कोई घर बार नहीं होता। कहीं भी सो लेते  हैं। कहीं भी आराम कर लेते हैं। उनके पास कोई बिछौना या अपना कहा जा सकने वाला कोई कोना भी नहीं होता। जबकि डॉगी के मालिक का घर ही उसका होम एड्रेस होता है। उसी घर में उसका अपना कहा जा सकने वाला अपना एक कोना या कमरा होता है और वहां उसका सारा सामान रखा रहता है। उसके ब्रश, खाने के बरतन, खेलने का सामान और दवा दारू। उसे घर भर में घूमने की आजादी और मैडम के बिस्तर में घुस कर लेट जाने की भी सुविधा होती है। बेशक वह एसी ऑन या ऑफ नहीं कर सकता लेकिन उसे यह सुविधा मिली होती है। कुत्ते झुंड में भी रह लेते हैं जबकि डॉगी को कई बार पूरा जनम अकेले ही काटना होता है। और तो और जिस कोठी में वह रहता है, उसके गेट पर ही उसकी मौजूदगी की घोषणा करता एक बोर्ड टंगा रहता है। बेशक आधार कार्ड या पैन कार्ड न तो किसी कुत्ते का होता है न किसी डॉगी या डॉगिन का, लेकिन डॉगी का बर्थ डे होता है और वह पूरी धूमधाम से मनाया जाता है। आमतौर पर कुत्ते अनपढ़ होते हैं लेकिन किसी भी भाषा में पुकारे या दुत्कारे जाने पर अपनी पूंछ हिला सकते हैं और की की भी कर सकते हैं लेकिन डॉगी की अपनी एक भाषा होती है और वह उसी भाषा में सारे संकेत और आदेश समझता है। 

आम तौर पर इंडियन फैमिली में पाले जाने वाले डॉगी की भाषा अंग्रेजी ही होती है। डॉगी पालने वाले परिवार में सब लोग बेशक आपस में पंजाबी, गुजराती या मराठी में ही बात करते हों, वे अपने डॉगी से अंग्रेजी और सिर्फ अंग्रेजी में ही बात करते हैं। आप कह सकते हैं कि डॉगीज़ की भाषा अंग्रेजी ही होती है। डॉगी पालने वाले की खुद की नस्ल कैसी भी हो, डॉगी हमेशा अच्छी नस्ल का ही पाला जाता है।

डॉगीज के प्रति प्रेम प्रदर्शन के लिए उनके फेसबुक अकाउंट, ट्विटर अकाउंट इंस्टाग्राम अकाउंट आदि खोले जाते हैं और वहां उनके फोटो हाबीज़ वगैरह शेयर किये जाते हैं। उनके क्लब होते हैं जहां मालिक लोग उन्हें वहां अपने जैसे दूसरे डॉगीज़ या डॉगिन के साथ मेल मुलाकात और कम्यूनिकेट करने के लिए हर शनिवार को ले जाते हैं। इसके लिए और उनकी बीडिंग के लिए भारी फीस अदा की जाती है।

आपने कुों को अक्सर मोटर साइकिलों, कारों या ट्रकों के पीछे भौंकते, इलाके से बाहर भगाते हुए देखा होगा। हम कह सकते हैं कि कुर्ता के तय इलाके होते हैं जिनमें दूसरे इलाकों के कुते या वाहन नहीं आ सकते लेकिन डॉगी को उसका स्टेटस इस तरह की घटिया हरकत करने की अनुमति नहीं देता। वे इसे बिलो डिग्निटी समझते हैं। वे चाह कर भी वे ऐसा नहीं कर सकते। वे बहुत हुआ तो गेट के अंदर आने वाले व्यक्ति पर सिर्फ गुर्रा सकते हैं।

कुत्ते काटते हैं लेकिन डोंगी चाट तो सकता है, काट नहीं सकता। कुत्ता किसी के भी आगे पूंछ हिला सकता है लेकिन डॉगी इसे ओछापन मानता है। यहां उसे मालिक के इशारे का इंतजार करना पड़ता है कि कौन अपना है और कौन पराया है। डॉगी सारे काम अपने मालिक की अनुमति से करता है। कुत्ता पैदल यात्री हैं और ट्रकों और कारों के पीछे भाग सकता है लेकिन डॉगी इस मामले में भाग्यशाली होता है कि वह ट्रेन में सिर्फ फर्स्ट एसी में ही यात्रा करता है और इस बहाने उसके मालिक लोग भी फर्स्ट एसी में ही यात्रा करने का सुख पा लेते हैं। मालिक की एसी कार तो उसकी सेवा में रहती ही है।

कुत्ते आम तौर पर बेरोजगार होते हैं। बहुत हुआ तो दो वक्त की रूखी सूखी रोटी या हड्डी के एकाध टुकड़े के बदले जीवन भर चौकीदारी करते पाये जाते हैं। लेकिन डॉग कहलाने वाले प्राणी के पास रोजगार के बहुत अवसर होते हैं। पुलिस, सेना, जासूसी जैसे बेहतरीन विभागों में उसे हाइ फाइव फीगर वाली और शानदार सुविधाओं वाली जॉब अपारचुनिटी मिलती हैं। डॉग रिटायर भी होते हैं। उन्हें फिल्मों में भी काम मिलता है और जिन हीरोइनों या हीरो लोगों के आसपास आम आदमी जाने की हिम्मत भी नहीं कर सकता, डॉगी को उनकी गोद में बैठने के और उनके बेडरूम में जाने के भी खूब पैसे मिलते हैं।

कुत्ता कुछ भी खा लेता है और कई बार भूखा भी रह लेता है। लेकिन डॉगी का बाकायदा डाइट चार्ट होता है और वह उसी के हिसाब से और तय टाइम पर तय खुराक के हिसाब से खाता है। डॉगीज़ के लिए खाने पीने के सामान के, बिस्किट और दूसरी चीजों के स्टोर्स होते हैं। 

कुत्ते आम तौर पर बीमार नहीं पड़ते और अगर बीमार पड़ते भी हैं तो अपने आप ही अपना देसी इलाज करना जानते हैं और इस तरह से वे ठीक भी हो जाते हैं। अपच होने पर कुत्ते घास खा कर और उसकी उलटी करके सब खाया पीया बाहर निकाल देते हैं और एकदम ठीक हो जाते हैं। जबकि डॉगीज़ के डाक्टर और अस्पताल होते हैं और वहां पर उनका अच्छे से इलाज होता है। बिल मालिक भरता है। और तो और उस अस्पताल में भर्ती होने पर पर्ची भी उसके मालिक के नाम की बनती है। नंबर आने पर पुकार भी मालिक की होती है- मिस्टर अंलख, बंसल या कंसल के डॉगी की बारी आ गयी है। डॉक्टर के चैम्बर में जाएं। 

कुत्ते कहीं भी कभी भी हग लेते हैं या खंबा वगैरह मिलने पर टांग उठा कर मूत देते हैं। वे ये काम स्वाभाविक तरीके से सदियों से करते चले आये हैं। लेकिन डॉग या डॉगिन ऐसा नहीं कर सकते। ऐसा करना उनके लिए असभ्यता की श्रेणी में आता है। उनके हगने मूतने के समय और जगह तय होते हैं। आपने पार्क वगैरह में सुबह के वक्त खूब सारे ऐसे सभ्य लोगों को देखा होगा कि वे अपने अपने डॉगी को इस काम के लिए खास तौर पर ले कर आते हैं। ब्लाक ए के डॉगी बी ब्लॉक में और बी ब्लॉक के डॉगी ए ब्लॉक में इस महान काम को अंजाम देते दिखायी देते हैं। कुत्ते को बहुत हुआ तो परिवार में शामिल मान लिया जाता है लेकिन इस रिश्ते का कोई नाम नहीं होता जबकि डॉगीज़ वाले अमीर लोग उसे अपने बेटे या बेटी के रूप में ही मानते हैं और घर पर आने वाले सभी मेहमानों यहां तक कि अपने माता-पिता, भाई-बहन, चाचा चाची या बड़े भाई, छोटे भाई के आने पर पहले डॉगी से उनका परिचय कराते हैं और कहते हैं – देखो मार्शल, देखो तुम्हारी दादी आई है, तुम्हारे चाचा आए हैं, तुम्हारे ताऊ आए हैं। इनको नमस्ते करो बेटा। अगर आने वाला किन्हीं जैविक कारणों से मेजबान के डॉग या डॉगिन से ये रिश्ता मंजूर करने पर खुद को असमर्थ पाता है तो इसका खामियाजा उसे ही भुगतना पड़ता है। मालिक साफ तौर पर घोषणा कर देते हैं कि आप हमारे घर आए हैं तो आपको हमारे डॉगी के साथ यह रिश्ता स्वीकार करना ही पड़ेगा। हमारे लिए पहले हमारा डॉगी है और उसके बाद आप। आप तो थोड़ी देर में चले जायेंगे लेकिन हमें रहना तो डॉगी के साथ ही है। अगर आपको अच्छा नहीं लगता कि हमारा डॉगी आपको दादा, चाचा या मामा कहे तो हमारे डॉगी को भी अच्छा नहीं लगता कि आप उसकी पीठ पर प्यार से हाथ न फेरें और उसे हमारे बच्चे की तरह आशीर्वाद न दें। संबंध तो जी दो तरफा होता है। आप हमारे डॉगी को स्वीकार करें, हमारे बच्चे जैसा प्यार दें तो ही वह आपको स्वीकार करेगा और आपके पैर चाटेगा, आपको नहीं काटेगा, आपको तंग नहीं करेगा।

क्षमा करें, कुत्ते और डॉगी की तुलना के चक्कर में असली किस्से से भटक गया। ता माामला ये है कि एक डॉक्टर साहिबा हैं। गाइनेक में पीजी की तैयारी कर रही हैं। मां बाप की अकेली संतान। अमीर घर बार। पिता रिटायर्ड प्रोफेसर और उसके बाद भी पढ़ाने में लगे हुए। दूसरे शहर में रहते हैं और पंद्रह दिन में एक बार घर आते हैं। माता एक बड़ी कंपनी की रिटायर्ड जनरल मैनेजर लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी कंसलटेंसी के काम में लगी हुई। सुबह की गयी शाम को देर से लौटती हैं। डॉक्टर साहिबा पीजी की परीक्षा की तैयारी के लिए दिन भर घर में अकेली रहती हैं। कभी कभी वे कुछ महीने रात की ड्यूटी लेते हुए जॉब करती हैं।

अब हुआ ये है कि उनके बड़े घर में उत्तम किस्म के दो बुजुर्ग डॉगी हैं। डॉक्टर साहिबा घर पर ही रहती हैं तो तय है कि इनकी देखभाल की, खाने पीने की, घुमाने फिराने, हगाने की सारी जिम्मेवारी मोहतरमा को संभालनी पड़ती है। घर में दो नौकरानियां आती हैं। एक बिहार की है और एक नेपाल की लेकिन ये दोनों डॉग्स केवल अंग्रेजी समझते हैं और दोनों बाइयों को अंग्रेजी नहीं आती। डॉक्टर साहिबा दुबली पतली, अकेली जान खुद को देखें या ड्यूटी के दौरान मरीजों को देखें या अपने डॉग्स को देखें या उससे बचने वाले समय के दौरान पी जी के परीक्षाओं की तैयारी करें। संकट है और बहुत बड़ा है। इसके बावजूद डॉक्टर साहिबा अपने डॉग्स से जी जीन से प्यार करती हैं। उनके हर तीसरे वाक्य में किसी न किसी संदर्भ में डॉग्स का जिक्र आ ही जाता है। उनके बचपन से ही उनके घर में कोई ना कोई डॉगी रहा है। उनका सारा बचपन, किशोरावस्था डॉगीज़ के साथ बीती है और युवावस्था डॉगीज़ के साथ बीत रही है। एमबीबीएस के दौरान को छोड़ कर वे कभी भी घर से बाहर नहीं रही हैं। डॉगी कोई भी रहा हो, उनके नाम स्थायी रूप से मार्शल और कैटी रहे हैं।

अब कहावत है कि सबके दिन फिरते हैं। डॉगीज़ के दिन भी फिर रहे हैं। वे भी बचपन से किशोरावस्था और वहां से युवावस्था में ठहरते हुए अब बुढ़ापे की तरफ आ चुके हैं। वे बेशक परिवार के स्थायी सदस्य हैं, उनका पूरा ख्याल रखा जाता है लेकिन अब दोनों डॉगी बुढ़ापे के कारण बीमार रहने लगे हैं। आप जानते ही हैं कि लोग मां-बाप को तो बुढ़ापे में वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं ताकि वे अपनी उम के दूसरे लोगों के साथ मिलकर, रह कर अपना वक्त गुजार सकें लेकिन अफसोस की बात है कि इन डॉगीज़ के लिए देश में कोई भी वृद्धाश्रम नहीं है। घर पर ही उनका ख्याल रखना पड़ता है। दोनों ही बार बार और बारी बारी से बीमार पड़ते हैं और मोहतरमा का शेड्यूल बिगड़ जाता है। डॉक्टर साहिबा सब काम छोड़ कर उनके डॉक्टरों के पास भागती हैं। उनकी देखभाल करनी पड़ती है, उनके पास बैठना पड़ता है, उनके बहते आंसू पोंछने पड़ते हैं और लगातार उनकी दवा दारू का ख्याल रखना पड़ता है। 

वे खुद भी बहुत नाजुक बदन और नाजुक मिजाज हैं। और खुद डॉक्टर होते हुए इन मरीजों को इस हालत में नहीं देख पाती। खुद उन्हें इस हालत में एक कंपनी की, अदद मदद की जरूरत होती है। और आप जानना चाहते होंगे कि हां ऐसे कठिन वक्त में उन्हें अपने कामकाज छोड़कर कंपनी देने के लिए कौन जाता होगा।

ऐसे में डॉक्टर साहिबा सब दोस्तों को फोन करती हैं। कोई तो डॉक्टर साहिबा की एक पुकार पर ही सारे कामकाम छोड़ कर बैग ले कर चला आये और डॉग्स की बीमारी की वजह से आए उनकी आंखों में आंसू पोंछे और उन्हें दिलासा दे कि चिंता ना करें सब कुछ ठीक हो जाएगा।

आजकल उनके पास कोई भी नहीं जा पा रहा उनके घर। आपके पास समय हो तो बात करूं। 

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