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चेहरा न देखो
Opinion

चेहरा न देखो

आज सुबह से ही परेशान हूँ। अखबार में एक तस्वीर छपी है। ग्रुप फोटो। लिखा है- डकैती की योजना बनाते हुए आठ डकैत गिरफ्तार। तस्वीर में आठ डकैतों के साथ उन दस पुलिस वालों के भी चेहरे हैं, जिन्होंने, बकौल अखबार के, अपनी जान की बाजी लगाकर उन्हें दबोचा। तस्वीर में वे हथियार भी दिखाई दे रहे हैं, जिनसे डकैती की जाती। 

यही तस्वीर मुझे परेशान किए हुए है। तस्वीर में सभी पुलिस वाले सादे लिबास में हैं, डाकू तो हैं ही। वैसे भी उनकी कोई यूनिफार्म नहीं होती। अब तक चार कप चाय गले से नीचे उतार कर भी तय नहीं कर पाया हूँ कि इस तस्वीर में जो 18 चेहरे नज़र आ रहे हैं, उनमें से आठ डाकू कौन-से हैं और दस पुलिस वाले कौन-से। सभी चेहरे एक जैसे खुंखार दिखाई दे रहे हैं। कुछेक की पूँछे भी हैं। अगर कुछ चेहरों पर पकड़े जाने की पीड़ा, आत्मग्लानि या अपराध बोध जैसा कुछ होता तो पता भी चलता, ये ही डाकू होंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। सभी-के-सभी काफी हद तक तृप्त, खाए-पीए और मस्त नजर आ रहे हैं। यहाँ वह कहावत झूठ साबित हो रही है कि आपका चेहरा आपके व्यक्तित्व और कर्मों का दर्पण होता है।

वैसे मैंने इस तस्वीर में तीन पुलिस वालों को पहचान लिया है, जो तोंदियल हैं, वे निश्चित ही पुलिस वाले होंगे। मैंने आज तक कोई तोंद वाला डाकू नहीं देखा, जैसे आज तक कोई हँसता हुआ पुलिसवाला नहीं देखा। 

मेरी दूसरी परेशानी है – यह तस्वीर किसके आग्रह पर खिंचवाई गयी होगी।

अखबारों में तो खैर, पुलिस विभाग ने ही भेजी होगी, लेकिन सबसे पहले किसे यह आइडिया आया होगा कि चलो एक ग्रुप फोटो हो जाए। याद बनी रहेगी। जैसे सार्क सम्मेलन वगैरह में विभिन्न देशों के प्रमुख जब भी मिलते हैं, अगले ही दिन अखबारों में उनका ग्रुप फोटो आ जाता है। पर मुझे नहीं लगता, वे लोग अपने बच्चों को दिखाने के लिए उसकी अलग से कॉपी बनवाते होंगे। पता नहीं, डाकुओं ने या पुलिस वालों ने अपने एलबम के लिए इस तस्वीर की कापियाँ बनवाई होंगी या नहीं। अलबत्ता, यह तय है, कि पुलिसियों के बच्चे अपने पापा को, पापा होने की वजह से पहचान लेंगे, लेकिन वे भी यह नहीं बता पाएँगे कि इस तस्वीर में और कौन-से पुलिस वाले हैं। 

डाकुओं की बीवियाँ भी अपने-अपने पतियों को तो पहचान लेंगी, लेकिन बिना कैप्शन की तस्वीर देखकर वे भी ज़रूर पूछेगी – पहले तो आपके ग्रुप में सिर्फ आठ डाकू थे, अठारह कब से हो गए? वे तस्वीर में दिखाई दे रहे तोंद वालों को देखकर यह भी ज़रूर कहेंगी – अरे, इन मुटल्लों को क्यों भर्ती कर रखा है – कभी इनके चक्कर में पकड़े जाओगे तो मुसीबत होगी। 

अक्सर ऐसा ही होता है। तस्वीरें भ्रम में डाल देती हैं। किसी तस्वीर में हम दो नेताओं को गले मिलते देखते हैं, लेकिन बाद में पता चलता है, उनमें एक अंडरवर्ल्ड किंग है, जो किसी दल में शामिल हो रहा है। दोनों इतने करीबी लगते हैं कि बताना मुश्किल, कौन अपना है और कौन अपनाया जा रहा है। 

एक बार मैं भी एक नायाब फोटो लेते-लेते रह गया। हुआ यूं कि मैं ट्रेन में बैठा हुआ था। बैग में कैमरा था। तभी दो पुलिस वाले एक चोर-उचक्के टाइप के आदमी को हथकड़ी डाले हुए लाए और मेरे सामने वाली सीटों पर बैठ गए। तीनों घुल मिल कर बातें कर रहे थे। शायद किसी अदालत की तारीख भुगतकर आ रहे थे, तभी उस उचक्के ने जेब से सिगरेट की डिब्बी निकाली। तीनों ने एक-एक सिगरेट ली। शायद माचिस किसी के पास नहीं थी। सहयात्री से माचिस माँगी गयी। मैं तब तक कैमरा निकाल चुका था। तय था, उचक्का हथकड़ी की वजह से माचिस नहीं जला सकेगा। एक पुलिसिए ने माचिस जलायी। एक सिगरेट जली। दूसरी जली। जब उचक्के की सिगरेट का नम्बर आया, तब तक मैं कैमरे का मुआइना करने का नाटक पूरा कर चुका था, सिर्फ क्लिक करना बाकी था। उधर सिगरेट जली और इधर दूसरे पुलिस वाले ने अपना डंडा मेरे पेट में घुसेड़ा। एंगल बिगड़ गया। वह यादगार फोटो तो रह ही गई, साथ ही जिन्दगी में पहली बार एक कांस्टेबल से गालियाँ भी सुनीं। काश, मैंने यह तस्वीर ले ली होती। वैसे, उस तस्वीर में आप वर्दी की वजह से पुलिवालों को पहचान लेते।

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