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दीवारों के दर्मियां

दो कदम आगे, दो कदम पीछे। फिर वही. . ., दो कदम आगे, दो कदम पीछे। कितने चक्कर यूं ही . . . । कमाल है, दुनियाँ इतनी सिमट भी सकती है, उसने सोचा न था। अगर सोचा होता तो क्या दुनियाँ...


लिखते क्यों नहीं

काली अंधेरी रात में, छत की मुंडेर पर बैठा वह प्रेत.छाया की तरह लग रहा है। निश्चल. . , निर्द्वंद. . ., स्थिर और अकेला. . .। लेकिन ऐसा है नहीं। हो भी कैसे? क्या सब कुछ वैसा...