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TEEN EKAANT

by Nirmal verma
4.4
4.4 out of 5

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Creators
Author Nirmal verma
Publisher Vani Prakashan
Synopsis आमतौर पर हिन्दी की अधिकांश कहानियों में, स्मृति का ‘इस्तेमाल’ है- निर्मल वर्मा के यहाँ स्मृति को जीने की कोशिश। यहाँ ‘रिकलेक्शन’ नहीं ‘मेमोरी’ है। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि निर्मल वर्मा की कहानियों में उनके पात्र महत्त्वपूर्ण हैं या वे दृश्य, जिनमें रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की बहुत छोटी-छोटी चीजें , एक आत्मीय लय के साथ मन के भीतर खुलती हैं।...मेरा ख़याल है - बिल्कुल निजी अनुभव के साक्ष्य पर यह बात कह रहा हूँ- कि अपने मन में निर्मल वर्मा की कहानियों को पाकर, हम मानवीय सम्बन्धों की गहराई में उतरते हैं। यह इसलिए मुमकिन होता है कि निर्मल वर्मा की कहानियों में व्यक्तिमत्ता है और समग्र कथा-प्रवाह को बेहद ऐन्द्रिक भाषा के सहारे, हमारे अन्तर्जीवन से जोड़ दिया गया है। यह कोई चिपकाने की कला नहीं है, बल्कि संश्लेषण है। इस अनुभव से गुज़रते हुए प्रायः हम, तथाकथित मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की दयनीय सीमाओं से परिचित होते हैं।

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About the author निर्मल वर्मा (3 अप्रैल 1929 - 25 अक्तूबर 2005 ) हिन्दी के आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे। शिमला में जन्मे निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार(1995 ), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985 ) उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। परिंदे (1958 ) से प्रसिद्धि पाने वाले निर्मल वर्मा की कहानियां अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती हैं। ब्रिटिश भारत सरकार के रक्षा विभाग में एक उच्च पदाधिकारी श्री नंद कुमार वर्मा के घर जन्म लेने वाले आठ भाई बहनों में से पांचवें निर्मल वर्मा की संवेदनात्मक बुनावट पर हिमांचल की पहाड़ी छायाएं दूर तक पहचानी जा सकती हैं। हिन्दी कहानी में आधुनिक-बोध लाने वाले कहानीकारों में निर्मल वर्मा का अग्रणी स्थान है। उन्होंने कहानी की प्रचलित कला में तो संशोधन किया ही, प्रत्यक्ष यथार्थ को भेदकर उसके भीतर पहुंचने का भी प्रयत्न किया है। ‘रात का रिपोर्टर’, ‘एक चिथड़ा सुख’, ‘लाल टीन की छत’ और ‘वे दिन’ निर्मल वर्मा के चर्चित उपन्यास है। उनका अंतिम उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ 1990 में प्रकाशित हुआ था। उनकी सौ से अधिक कहानियाँ कई कहानी संग्रहों में प्रकाशित हुई। 1958 में ‘परिंदे’ कहानी से प्रसिद्धी पाने वाले निर्मल वर्मा ने ‘धुंध से उठती धुन’ और ‘चीड़ों पर चाँदनी’ यात्रा वृतांत भी लिखे, जिसने उनकी लेखन विधा को नये मायने दिए। 1959 से 1972 के बीच उन्हें यूरोप प्रवास का अवसर मिला। वह प्राग विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या संस्थान में सात साल तक रहे। उनकी कहानी ‘माया दर्पण’ पर 1973 में फ़िल्म बनी जिसे सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म का पुरस्कार मिला। वे इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज़ (शिमला) के फेलो (1973), निराला सृजनपीठ भोपाल (1981-83) और यशपाल सृजनपीठ (शिमला) के अध्यक्ष रहे। 1988 में इंग्लैंड के प्रकाशक रीडर्स इंटरनेशनल द्वारा उनकी कहानियों का संग्रह 'द वर्ल्ड एल्सव्हेयर' प्रकाशित हुआ। इसी समय बीबीसी द्वार उन पर एक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म भी प्रसारित हुई।
Specifications
  • Language: Hindi
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Pages: 74
  • Binding: PaperBack
  • ISBN: 9789387155879
  • Category: Language & Essay
  • Related Category: Arts / Humanities
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