Ajneya Ka KaviKarm Ajneya Ka KaviKarm
Rated 4.3/5 based on 33 customer reviews
126 In stock
Product description: Ajneya Ka KaviKarm is written by Ramesh chandra shah and published by Vani prakashan. Buy Ajneya Ka KaviKarm by Ramesh chandra shah from markmybook.com. An online bokstore for all kind of fiction, non fiction books and novels of English, Hindi & other Indian Languages.

HomeNonfictionReference Work Ajneya Ka KaviKarm

Ajneya Ka KaviKarm

by Ramesh chandra shah


logo logo

Buy Now Buy at Amazon Buy Now Buy at Flipkart
Author Synopsis
Not Available
‘हर कोई मेरा लिखा हुआ जरूर पढ़े ही, ऐसा मेरा कोई आग्रह नहीं है अज्ञेय का कहना था ‘‘किन्तु हर कोई मेरा पाठक हो सकता है, ऐसा मैं मानता हूँ। ‘‘यह भी, कि... ‘‘मानव में मेरी श्रद्धा है। मानव-मात्रा को मैं अभिजात मानता हूँ।’’... इससे ज्यादा मुँहतोड़ जवाब भला और क्या हो सकता है उन लोगों को, जो एक लाइलाज लत की तरह इस ‘अभिजात’ शब्द का प्रयोग गाली की तरह अज्ञेय के विरुद्ध करते रहे हैं। अज्ञेय जन्म शतवार्षिकी आयोजन के सिलसिले में प्रस्तुत कवि-आलोचक रमेश चन्द्र शाह के ये आलेख अज्ञेय को लेकर उनके अद्यतन मूल्यांकनकारी उपक्रम कहे जा सकते हैं। इनमें खासी रीझ-बूझ और विश्लेषणात्मक अध्यवसाय के बूते यह दर्शाने का प्रयत्न किया गया है कि किस तरह अज्ञेय का काव्य-कृतित्व प्रसाद-युग से लेकर युवा कविता तक के विकास- क्रम को अपने में समेटे हुए है; और यह भी, कि पद्य और गद्य की सभी विद्याओं में फलता-फूलता अज्ञेय का अनूठा मानवनिष्ठ स्वातन्त्रय-दर्शन क्यों और किस तरह आज के भूमंडलीकृत विश्व में अपने देशवासियों को पूरे सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ नयी रचना करने की प्रेरणा देने वाला और सच्चे अर्थों में एक आत्म-वान् भारतीय आधुनिकता का पथ प्रशस्त करने वाला है। शाह के कथनानुसार अज्ञेय-काव्य की विशेषता ऐसी अनुभूतियों और प्रतीतियों को भी अभिव्यक्ति के दायरे में खींच लाने में निहित है जो हम सभी के जीवनानुभव में कुछ सार्थक जोड़ती हुई उसे समृद्ध करती है। किन्तु इसके साथ ही साथ अनुभव और अभिव्यक्ति कौशल दोनों के धनी इस कवि में एक अधूरेपन की कसक भी बराबर झलकती महसूस की जा सकती है: ‘‘है, बहुत कुछ और है, जो कहा नहीं गया...’’। अज्ञेय का कवि-कर्म शब्द-साधना और कर्म-साधना से ही नहीं, गहरे कहीं किसी ‘शब्दातीत अर्थ’ की प्रतीति से भी जुड़ा हुआ है, जो उत्तरोत्तर उनके यहाँ गहराती गयी है। ‘आलोचक राष्ट्र’ के निर्माण की संकल्पना अज्ञेय की आधुनिकता का पहला पड़ाव है। पर, शाह बलपूर्वक इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि संस्कृति के निर्माण की जिस चिर-जागरूक चेष्टा की वकालत अज्ञेय कर रहे हैं, वह अतीत से नहीं, भविष्य से जुड़ी है। तभी तो वे आधुनिकता की बात को हिन्दी की बात बनाकर ही आत्मविश्वासपूर्वक आधुनिक और प्रगतिशील होने का अर्थ समझाते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि हिन्दी अपने स्वभाव और स्वधर्म से ही आगे देखने वाली भाषा है।
Related Books
Books from this Publisher view all
Trending Books
Bookshelves
Festival Offers Jawahar Lal Nehru Junior's Library Pre Order Vani Prakashan Books Amar Chitra Katha Vallabhbhai Patel In trend Taaza Tareen Hindi Classics Popular Authors Selfhelp & Philosophy