Dukhiyari Larki Dukhiyari Larki
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Product description: Dukhiyari Larki is written by Taslima nasrin and published by Vani prakashan. Buy Dukhiyari Larki by Taslima nasrin from markmybook.com. An online bokstore for all kind of fiction, non fiction books and novels of English, Hindi & other Indian Languages.

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Dukhiyari Larki by Taslima nasrin

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Author Synopsis
तसलीमा नसरीन सुख्यात लेखक और मानवतावादी विचारक हैं। अपने विचारों और लेखन के लिए उन्हें अकसर फ़तवों का सामना करना पड़ा। विवादास्पद उपन्यास ‘लज्जा’ पर उन्हें उनके देश से निष्कासित कर दिया गया जहाँ वे 1994 से नहीं गईं। भारत समेत कई देशों से उन्हें विभिन्न सम्मानित पुरस्कारों और मानद उपाधियों से विभूषित किया जा चुका है। दुनिया की लगभग तीस भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद हो चुका है।
‘‘नहीं, मैं कोई धर्म नहीं मानती। मैं तथाकथित ऊँचे तबकों को भी नहीं मानती। मेरा धर्म मानवता है। मैं न नारीवादी हूँ, न बौद्धिक ! समाज की नाइंसाफी, औरत मर्द में विसमता, पुरुष-शासित समाज में औरत को दूसरे दर्जे से भी बदतर नागरिक बनाए जाने से मेरा जी दुखता है। ‘‘ऐसे भी लोग हैं, जो यह मानते हैं कि हिन्दु लोग सभ्य हैं, पढ़े-लिखे सहनशील हैं, अपने धर्म की आलोचना सह लेते हैं, मुसलमान नहीं सह पाते, क्योंकि वे लोग मूरख और अनपढ़ हैं, असहनशील हैं। दुनिया में सभी धर्मों की आलोचना संभव है, सिर्फ इस्लाम धर्म की आलोचना असंभव है-जिन लोगों ने भी यह नियम बनाया है, उन लोगों ने और कुछ भले किया हो, मुसलमानों का भला नहीं कर रहे हैं।

मुस्लिम औरतों की मुक्ति की राह में भी लोग काँटे बिछा रहे हैं। जिस अँधेरे की तरफ उन्हें रोशनी डालनी चाहिए, वहाँ तक रोशनी पहुँचने ही नहीं देते। अगर कोई और उस पर रोशनी डाले, तो वे ही लोग, साम-दाम-दंड-भेद से उसे बुझा देते हैं। ‘‘मैंने मुल्ला-मौलवियों के पांखड पर वार किया था, उनकी पोल-पट्टी खोली थी। बाबरी मस्जिद के ध्वंस की प्रतिक्रिया में बंलादेश में जो दंगे भड़के, उस पर मैंने ‘लज्जा’ लिखी, उसे ही मेरा गुनाह मान लिया गया। राजनीतिक सत्ता और धार्मिक कट्टरता से बगावत के जुर्म में, मुझ पर फतवा लटका दिया गया, मेरी फाँसी की माँग की गई, यहाँ तक की मुझे देश-निकाला दे दिया।’’

‘‘बंग्लादेश से प्रकाशित, तुम्हारा ‘क’ आत्मकथा का तीसरा खंड ज़ब्त कर लिया गया। उसमें ऐसा क्या है, जो लोग भड़क गए ?’’
तसलीमाँ हँस पड़ी, ‘‘उसमें मैंने उन साहित्यकारों, पत्रकारों, अफसरों और समाजसेवकों के बखिए उधेड़े हैं, जिन्होंने मुझ पर घिरे संकट का फायदा उठाते हुए, मुझसे सेक्स-संबंध स्थापित किए।’’ किताब का एक अंश।
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