Ande Ke Chhilke,Anya Ekanki Tatha Beej Natak Ande Ke Chhilke,Anya Ekanki Tatha Beej Natak
Rated 4.1/5 based on 11 customer reviews
287 In stock
Product description: Ande Ke Chhilke,Anya Ekanki Tatha Beej Natak is written by Mohan rakesh and published by Radhakrishna prakashan. Buy Ande Ke Chhilke,Anya Ekanki Tatha Beej Natak by Mohan rakesh from markmybook.com. An online bokstore for all kind of fiction, non fiction books and novels of English, Hindi & other Indian Languages.

HomeLiteratureDrama Ande Ke Chhilke,Anya Ekanki Tatha Beej Natak

Ande Ke Chhilke,Anya Ekanki Tatha Beej Natak

by Mohan rakesh


₹350
₹28718%OFF
location CHECK
Generally Delivered in 3-5 days.

Not Available Notify me NOTIFY ME
Author Synopsis
Mohan Rakesh (1925?1972) was a modernist innovator in Hindi who deeply influenced India?s multilingual literary culture after Independence. His full-length plays?Ashadh ka ek din (1958), Lahron ke rajhans (1963) and Adhe adhure (1969)?became seminal works of urban drama and theatre, while his fiction sustained the ?new story? and ?new novel? movements nationally. Consolidated by four decades of posthumous publication, his prolific output as theatre theorist, literary and cultural critic, translator, travel writer, diarist and correspondent now positions him as a transformative figure in postcolonial literature worldwide.
आधुनिक हिन्दी नाटय साहित्य और कथा की दुनिया में मोहन राकेश का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है । हिन्दी-रंगान्दोलन को एक नई गति और समृद्धि देने में उनकी निर्णायक भूमिका रही है ।
--पडे खे छिलके अन्य एकाकी तथा बीज नाटक उनके कई प्रयोगधर्मी एकांकियों का संग्रह है । प्रयोगशीलता को मोहन राकेश रंगमंच की भाषा और उसके मानवीय पक्ष की समृद्धि से जोड़कर देखते थे, अर्थात् रंगमंचीय उपकरणों की न्यूनता के बावजूद कठिन से कठिन प्रयोग कर पाने की क्षमता के साथ जोड़कर । डी. जयदेव तनेजा राकेश के नाटकों की एक दुर्लभ विशेषता पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि ' 'उनके नाटकों में मंचीय सफलता और प्रदर्शनीयता के साथ-साथ साहित्यिकता और पठनीयता का भी विलक्षण गुण विद्यमान है । उनमें इन दोनों विशेषताओं का अद्‌भुत सामंजस्य हुआ है । नाटकों को पदय मानने का ही यह परिणाम है कि उनके नाट्‌य-संवादों और रंग-निर्देशों की भाषा में कोई अन्तर नहीं है । सम्भवत: यही कारण है कि उनके नाटकों को देखते या सुनते हुए ही नहीं, पढ़ते हुए भी बीच में छोड़ना कष्टकर प्रतीत होता है । ''
संक्षेप में, इस संग्रह में शामिल नाटकों को हम राकेश के बहुस्तरीय नाट्‌य-लेखन के समर्थ उदाहरणों के रूप में देख सकते हैं ।
Related Books
Books from this Publisher view all
Trending Books
O
F
F
E
R
S
Bookshelves
Festival Offers Jawahar Lal Nehru Junior's Library Pre Order Vani Prakashan Books Amar Chitra Katha Vallabhbhai Patel In trend Taaza Tareen Hindi Classics Popular Authors Selfhelp & Philosophy