Kavita Ka Sangharsh Kavita Ka Sangharsh
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Kavita Ka Sangharsh

by Kumarendra parasnath singh


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Author Synopsis
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‘कविता का संघर्ष’ कवि कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह के आलोचनात्मक लेखों का संकलन है। हिन्दी कविता को सार्थकता प्रदान करने वाले साठोत्तरी पीढ़ी के कवियों में कुमारेन्द्र विशिष्ट महत्त्व रखते हैं। नयी कविता के बाद हिन्दी कविता को नया अर्थ, नयी भाषा और नया मोड़ जिन कवियों ने दिया उनमें कुमारेन्द्र का भी नाम पहली पंक्ति के कवियों में आता है। हिन्दी कविता यदि मध्यवर्गीय दुनिया से निकलकर व्यापक जन समुदाय का हिस्सा बनी और इस प्रयास में उसकी जमीन, भाषा और भंगिमा बदली तो उसका श्रेय कुमारेन्द्र को भी जाता है। उनके कवि-कर्म और आलोचना-कर्म से हिन्दी कविता के विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। कुमारेन्द्र जितने विचारवान और जनपक्षधर कवि थे, उतने ही प्रतिबद्ध साहित्य चिन्तक और आलोचक भी। उनके लिखे वैचारिक लेखों ने उस समय बहुतेरी साहित्यिक बहसों को जन्म दिया। मुक्तिबोध की तरह वे कविता और आलोचना दोनों ही मोर्चों पर जीवन भर सक्रिय रहे। उनमें शब्द और कर्म का कोई द्वैत नहीं था। यही कारण है कि उनके लेखों में जन पक्षधर वैचारिकता के साथ वह नैतिक आभा भी है जिसका बहुतों में अभाव होता है। प्रस्तुत संकलन के लेख कुमारेन्द्र के वैचारिक साहित्य चिन्तन का आत्मीय साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। ‘कविता का संघर्ष’ नयी कविता के बाद की हिन्दी कविता के विकास की वैचारिक यात्रा का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इसके जरिए न सिर्फ कुमारेन्द्र की कविता सम्बन्धी वैचारिक यात्रा का पता चलता है, बल्कि हिन्दी कविता में आये सार्थक बदलावों को भी रेखांकित करने में मदद मिलती है। निस्सन्देह साठोत्तरी हिन्दी कविता को समझने की यह जरूरी किताब है, जिसके बिना कविता सम्बन्धी कोई भी बहस पूरी नहीं होती। - गोपेश्वर सिंह
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