Bharatiya Nari Sant Parampara Bharatiya Nari Sant Parampara
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Bharatiya Nari Sant Parampara

by Baldev vanshi

  • Language: Hindi
  • Publisher: Vani prakashan
  • Pages: 142
  • Binding: Hardback
  • ISBN: 9789350005101
  • Category: Poetry
  • Related Category: Literature
  • MBIC: MMB7124563

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Author Synopsis
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भारतीय अमर नारी सन्तों ने समाज की जड़ता को तोड़ने की खातिर, जाति-पाँति, ऊँच-नीच, साम्प्रदायिकतापूर्ण भेदभाव को मिटाने के लिए बड़ी गहरी चोटें दी हैं। पुरुष सन्तों से भी गहरी-गम्भीर! क्योंकि उन्होंने दलित वर्ग के पुरुषों से भी अधिक घिनौने अपमान, लांछन, भूख और अन्याय के दंश सहे हैं। वेद कालीन समता, स्वतन्त्राता, सम्मान व शिक्षा के अधिकारों के क्रमशः खोते जाने और अज्ञानता (आत्म-अज्ञानता-वेदज्ञान वंचित), अविद्या के गहन अन्धकार में धकेल दिये जाने के बाद, नारी मात्रा को भोग्य पदार्थ एवं क्रय-विक्रय की वस्तु बल्कि, इससे भी नीचे पाँव की जूती’ बना दिये जाने की घोर जलालतभरी, नारकीय स्थितियों को भोगना पड़ा। इस कारण विवशता में ही सही चुपचाप, खामोश रहकर समाज को, उक्त स्थितियाँ रचने के कारण, नंगा किया। उन्होंने घर छोड़ दिये, अकेली हो गयीं पर झुकी नहीं। पुरुष सन्त जो प्रायः समाज के निम्न, दलित, उपेक्षित वर्ग से आते हैं, उन्हीं के संग साथ में रह कर भी नारी सन्तों ने भगवान को अपनी, अपने वर्ग की, आपबीती भी सुनाई, मुक्ति की गुहार भी लगाई। भगवान को उलाहने भी दिये कि कैसे मनुष्यों की दुनिया में उसने उन्हें धकेल दिया। नारी सन्त तो दलितों की भी दलित हैं। उनकी यातनाएँ तो दोहरी-चौहरी हैं। किन्तु अपनी और समूचे मानव समाज की मुक्ति का मार्ग उन्होंने दिखाया। आत्मछन्द को उपलब्ध करके, स्वच्छन्द हो जाना है, मुक्त हो जाना है।
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