Maryada Purushottam Maryada Purushottam
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Product description: Maryada Purushottam is written by Nagarjun and published by Vani prakashan. Buy Maryada Purushottam by Nagarjun from markmybook.com. An online bokstore for all kind of fiction, non fiction books and novels of English, Hindi & other Indian Languages.

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Maryada Purushottam

by Nagarjun

  • Language: Hindi
  • Publisher: Vani prakashan
  • Pages: 148
  • Binding: Hardback
  • ISBN: 9789350721063
  • Category: History
  • Related Category: Historical
  • MBIC: MMB6602119

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Author Synopsis
नागार्जुन (30 जून 1911-5 नवंबर 1998 हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। इनके पिता श्री गोकुल मिश्र तरउनी गांव के एक किसान थे और खेती के अलावा पुरोहिती आदि के सिलसिले में आस-पास के इलाकों में आया-जाया करते थे। उनके साथ-साथ नागार्जुन भी बचपन से ही “यात्री” हो गए। आरंभिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृत में हुई किन्तु आगे स्वाध्याय पद्धति से ही शिक्षा बढ़ी। राहुल सांकृत्यायन के “संयुक्त निकाय” का अनुवाद पढ़कर वैद्यनाथ की इच्छा हुई कि यह ग्रंथ मूल पालि में पढ़ा जाए। इसके लिए वे लंका चले गए जहाँ वे स्वयं पालि पढ़ते थे और मठ के “भिक्खुओं” को संस्कृत पढ़ाते थे। यहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली।
छः से अधिक उपन्यास, एक दर्जन कविता-संग्रह, दो खण्ड काव्य, दो मैथिली; (हिन्दी में भी अनूदित) कविता-संग्रह, एक मैथिली उपन्यास, एक संस्कृत काव्य "धर्मलोक शतकम" तथा संस्कृत से कुछ अनूदित कृतियों के रचयिता नागार्जुन को 1969 में उनके ऐतिहासिक मैथिली रचना पत्रहीन नग्न गाछ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था। उन्हें साहित्य अकादमी ने १९९४ में साहित्य अकादमी फेलो के रूप में नामांकित कर सम्मानित भी किया था।
राम की कथा को नए ढंग से और नए प्रतिमानों के साथ नागार्जुन ने पेश किया है। पुराने जमाने में हमारे यहाँ राजपूतों के खानदान बहुत प्रसिद्ध थे। एक चन्द्र वंश, दूसरा सूर्य वंश राम सूर्य वंशी थे। सूर्य वंशी राजाओं का इतिहास कई पुराणों में मिलता है। अयोध्या उनकी राजधनी थी। देश का नाम कोशल था, जिसे आजकल अवध कहते हैं। यह अयोध्या सरयू नदी के तट अब भी एक तीर्थ में विद्यमान है। इसको बसाने का श्रेय राजा युवनाश्व को है। वह मान्धाता के पुत्र थे। राजा युवनाश्व के कोई पुत्र नहीं था। पुत्र प्राप्ति के लिए उन्होंने यज्ञ किया। यह उपन्यास वर्तमान समाज को आईना दिखता प्रतीत होता है।
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